जूट से संवारी जिदंगी जिंदगी में छोटी सी छोटी बात भी कब अहम साबित हो सकती है। इसे संगीता से बेहतर कोई नहीं जान सकता। घर की आर्थिक तंगी को दूर करने के लिए साधारण समङो जाने वाले जूट से बनी कलाकृति ने आज संगीता को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है। जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा नहीं था। जूट से बने सामानों ने उनको ऐसी पहचान दी कि आज वंचित तबके से ताल्लुक रखने वाली संगीता अपने इलाके की एक मिसाल बन गयी है। आठवीं पास संगीता एक संदेश है वैसी महिलाओं के लिए जिन्होंने खुद को हर कदम पर खुद से ही जद्दोजहद करते हुए पाया है। बुर्का में मोती लगाने से हुई थी शुरुआत दरअसल सफलता के इस कहानी की शुरुआत तब हुई थी जब संगीता के पति राजधानी पटना में ऑटो चलाते थे। यह सन् 1997 की बात है। एक ऑटो चलाने वाले पर घर की सारी आर्थिक स्थिति टिकी रहती थी। कुछ पैसे और घर में आ सके इसके लिए संगीता ने बुर्का में मोती लगाने का काम शुरू किया। इसी बीच में संगीता के पति ने देखा कि जूट का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कुछ उत्सुकता और कुछ आर्थिक रुप से मजबूत होने की चाहत से संगीता के पति ने उनको जूट से सामान बनाने के लिए प्रशिक्षण दिलवाने का निश्चय किया। प्रशिक्षण मिलने के बाद पटना के पटेल नगर में संगीता ने एक दुकान भी लगाया था लेकिन इसी बीच में संगीता के ससुर की मृत्यु हो जाने के बाद सब लोग पटना से वापस अपने गांव जमुई जिला के प्रधानचक गांव चले गये। गांव में भी जूट से बना रहा लगाव गांव जाने के बाद भी जूट और इससे बने सामानों के प्रति संगीता का लगाव बना रहा। इसी बीच संगीता के पति की नौकरी सबौर विश्वविद्यालय में चालक के पद पर लग गयी। पति के सबौर चले जाने के बाद संगीता को घर के दूसरे काम पर भी ध्यान देना पड़ता था। बकौल संगीता ‘घर की जिम्मेवारी उठाने के साथ जूट के सामानों मैं बराबर ध्यान देती रही’। यकीन यही था कि मेरे काम का फल मुङो जरूर मिलेगा। आज वही हो रहा है। पति ने दिया साथ तो बन गयी बात जूट और उसके सामानों के प्रति ललक बढ़ाने के काम में संगीता को उसके पति का साथ मिला। सबसे पहले 12 हजार रुपये में मोती, धागा, जूट का कपड़ा, तुलसी लकड़ी की मोती आदि सामानों को संगीता के पति ने कोलकाता से मंगवाया। पति की नौकरी जब सबौर में लग गयी तब सारी जिम्मेवारी संगीता ने अपने ऊपर ले लिया। काफी समय गुजरने के बाद सन् 2011 में बिहार दिवस के मौके पर गांव में ही स्टॉल लगाया जहां संगीता के सामान को पहली बार लोगों ने देखा। गांव की महिलाओं को देती है प्रशिक्षण उनकी इस अद्भुत कला को देखने के लिए गांव की महिलाएं भी आने लगी। कुछ ने सीखने की इच्छा भी जताई। पहले एक-दो महिलाओं ने ही इसमें रुचि दिखाई लेकिन बाद में इनकी संख्या बढ़ती गयी। आज संगीता के पास गांव की ही लगभग 20-25 महिलाएं जूट का काम सीखने आती है। उनके कामों की भी सराहना हो रही है। सबौर से खुला कामयाबी का रास्ता सन् 2012 में सबौर में तकनीकी सप्ताह कृषि विज्ञान मनाया जा रहा था। संगीता के पति ने उसमें इन कलाकृतियों की स्टॉल लगाने की बात सोची। आयोजिन समिति से बात कर के उन्होंने जूट से बने सामानों का स्टॉल पहली बार लगाया। जिसने भी देखा, खुल मन से सराहा। सबौर विश्वविद्यालय के कुलपति ने देखा तो उन्होंने भी इन सामानों को देख के खुल कर तारिफ की। पंजाब के लुधियाना शहर में जब स्टॉल लगा तो जूट का सामान वहा भी गया। वहां के लोगों ने इसे इतना पसंद किया कि सारा सामान बिक गया। जूट से बनाती है कई तरह का सामान वैसे तो संगीता कई तरह के सामान को बना कर लोगों को अपनी तरफ आकृष्ट करती है लेकिन उनके द्वारा बनाये गये पितौनी के बीज की माला, लकड़ी की मोतियों से बना शार्ट कोर, रक्तचंदन के बीज का लॉकेट, दुल्हन के गले में पहने जाने वाला दुल्हन सेट, चाभी रिंग, वुडेन बटन, जूट की गुड़िया की बहुत मांग है। इनका मूल्य 20 रुपये से लेकर एक हजार रुपये तक है। जूट के अलावा बांस की चूड़ी पर भी संगीता अब काम कर रही है। बाजार में इसकी भी मांग होने लगी है। 30 से 50 रुपये के बीच बिकने वाली एक चूड़ी को बांस की फट्टी को काट कर उस पर जूट का कपड़ा लगा कर बनाया जाता है। इसके अलावा भगवान शंकर की शिवलिंग की तरह शिवलिंग सीड, लॉकेट, बद्धी बनाने की योजना है। सारा काम खुद ही करती है पति के सबौर चले जाने के बाद सामान को खरीदने से लेकर उसे बेचने और आपूर्ति करने की जिम्मेदारी संगीता ने बखूबी संभाल ली है। वैसे तो जूट कोलकाता से आता है लेकिन कटिहार से भी जूट को मंगाया जाता है। वैसे ही बांका की एक संस्था है जहां से रक्तचंदन के बीज को मंगाया जाता है। बीज का दाम कोई स्थिर नहीं है। जैसी बीज होती है, वैसा उसका दाम होता है। जूट के बने सामान और उनको मिल रही प्रसिद्धि को देख कर कल तक जो लोग संगीता के काम और कला पर प्रश्नचिन्ह लगाते थे। आज वही इनकी मेहनत की सराहना करते हैं। खुद संगीता के शब्दों में कटिहार में लगे एक मेले में वरिष्ठ राजनेता तारिक अनवर ने उनकी कला को देखा और सराहा तब मन में एक अलग तरह से खुशी हुई। तब से मैंने और उत्साहित होकर काम करना शुरू कर दिया। कई जगह पर कर चुकी है अपनी कला का प्रदर्शन महज कुछ ही दिनों में सफलता की इबारत लिखने वाली संगीता की कला कई जगहों पर अपनी छाप छोड़ने में सफल रही है। पिछले साल दिसंबर में शुरू हुए जागृति रेल यात्रा में इन्होंने 14 हजार का सामान बेचा। इनके सामानों को सबने सराहा। खासकर विदेशी पर्यटकों ने। मुंबई से शुरू होने वाली यह विशेष रेल यात्रा देश के कई शहरों में गयी जहां लोगों ने इस यात्रा में शामिल लोगों की कला को सराहा। इसके अलावा कटिहार, कोलकाता, लुधियाना में भी इनके सामानों का स्टॉल लग चुका है। जूट के सामान से बढ़ता आत्मसम्मान जूट का उपयोग कई तरह से होता है। इससे कई तरह का सामान बनते हैं। जूट का एक और उपयोग हो रहा है। इससे आधी आबादी अपने जीवन को संवार रही हैं। तरक्की और आधुनिकता के इस दौर में आधी आबादी कई विकल्पों पर काम कर के अपनी कार्यक्षमता को साबित कर रही है। वैशाली के ग्रामीण इलाके की यह महिलाएं जूट से कई तरह के सामान को बनाकर न केवल उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा रही हैं बल्कि आर्थिक स्तर पर भी खुद को सुदृढ कर रही हैं। सबल बनाने के लिए सहारा महिला और उनकी हितों में कार्य करने वाली संस्था से जुड़ी माला बताती हैं, हमारा काम पूरे बिहार में चलता है। ध्येय यही होता है कि ग्रामीण इलाके की वैसी महिलाएं जो प्रतिभा संपन्न हैं, उनकी प्रतिभा को सामने लाया जाये और उन्हें इस तरह से प्रशिक्षण दिया जाये कि वह अपने काम को निखारने के साथ आर्थिक तौर पर भी मजबूत हो सकें। प्रयास यही रहता है कि जिस महिला की जैसे कार्य में रुचि हो, उसी कार्य में उनका सहयोग किया जाये। हमारी संस्था इसके लिए अपने स्तर से उन क्षेत्रों में एक सर्वे कराने के बाद यह निर्णय लेती है कि महिलाएं किस कार्य को करना चाहती हैं। पूरे राज्य में कई जगहों पर कई तरह के कार्य आधी आबादी की उन्नति के लिए हो रहे हैं। खुद बनायी राह वैशाली जैसे इलाके में जूट को कार्य कराने को लेकर पूछने पर माला बताती हैं, इसके लिए जब क्षेत्र को चुना गया तो इन सभी महिलाओं से यह जानने की कोशिश की गयी कि वह किस तरह का कार्य करना चाहेंगी? कई विकल्प भी बताये गये थे, सभी ने जूट के कार्य को करने में अपनी सहमति जतायी। तब इस कार्य को आरंभ किया गया। वह कहती हैं, सन् 2002 में इसकी नींव डाली गयी थी। तब करीब 65 महिलाओं को इस काम में जोड़ा गया था। अभी इनकी संख्या में कुछ कमी आई है। फिर भी करीब 30 महिलाएं लगातार इस काम को कर रही हैं। सरकार भी करती है इस कला की कद्र खूबसूरत डिजाइनों से सजी धजी जूट के बैग, टिफिन बैग, बोतल बैग सभी को बखूबी आकर्षित करते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कि कम कीमत में लोगों को डिजाईनों के कई विकल्प मिल जाते हैं। बैग की कीमत 45 से 350 रुपये के बीच है। यह कीमत जूट के गुणवत्ता और डिजाइन पर निर्भर करता है। इन महिलाओं के द्वारा बनाये गये फाइल फोल्डर की भी मांग हमेशा बनी रहती है। ये फोल्डर जूट से बने होने के कारण पर्यावरण के अनुकूल तो होते ही हैं, साथ ही मजबूत होने के कारण भी खरीदार इसे काफी पसंद करते हैं। माला बताती हैं, राज्य सरकार हमेशा इन महिलाओं के द्वारा बनाये गये फाइल फोल्डर को खरीदती रहती है। सरकार से जब भी आदेश मिलता है, जूट के बने इन फोल्डरों की आपूर्ति कर दी जाती है। वह कहती हैं, ज्यादातर सरकारी विभाग हमारे पास से हमेशा फाइल फोल्डर लेते हैं। इनकी कीमत 110 रुपये से 275 रुपये के बीच होती है। वह कहती हैं, आमतौर पर बाजार के हिसाब से दर तय होता है। पूरे साल में मई से जून तक थोड़ी धीमी गति से कार्य होता है, लेकिन जुलाई महीने से कार्य फिर प्रगति पर आ जात है। इन महीने में ऑर्डर मिलने शुरू हो जाते हैं। जितना ज्यादा ऑर्डर मिलता है। आमदनी भी उसी रुप में होती है। जूट के पीस के ऊपर भी आमदनी होती है। कहीं का जूट, कहीं की मेहनत इन सामानों को बनाने के लिए रॉ मेटेरियल वाले जूट को कोलकाता से मंगाया जाता है। शुरू में यह काम संस्था के स्तर पर होता था, लेकिन जैसे जैसे महिलाओं ने अपनी जिम्मेदारी को संभाला। अपने काम को भी बांट लिया। अब केवल संपर्क करने पर ही रॉ मेटेरियल वाला जूट आ जाता है। नया प्रयोग खरीदारों को भाया आकर्षित करने वाले डिजाइन वाले बैग, फोल्डर वैसे तो पहले से ही लोगों को पसंद है। इन महिलाओं ने कुछ नया करने के लिए जूट के साथ कॉटन को मिला कर एक नया प्रयोग किया है, जिसे ‘जोकूकॉटन’ नाम दिया गया है। इससे डीलक्स डिजाइन वाले बैग बनते हैं। बाजार में इनकी मांग बहुत है। प्रदर्शनी में दिखाया दम गांव की महिलाओं को दुनिया के सामने लाने के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करने के बाद कुछ और भी पहल की गयी है। इसके बारे में माला बताती हैं, राज्य सरकार और विभागीय स्तर पर जो भी प्रदर्शनी लगती हैं, उनमें महिलाएं अपनी सहभागिता को पूरी ईमानदारी से निभाती हैं। साल में छह - सात बार प्रदर्शनी में हिस्सा लेती हैं। कोई पुरस्कार तो नहीं मिला है लेकिन प्रदर्शन में इस कार्य को लेकर लोगों में काफी आकर्षण बना रहता है। सामाजिक कार्यो से भी सरोकार इस काम को करने वाली सभी महिलाएं नाम मात्र के लिए शिक्षित हैं। उनके अंदर शिक्षा की लौ जगाने के लिए भी संस्था द्वारा कार्य किया जाता है। बकौल माला, हमारी यह पूरी कोशिश होती है कि काम करने के साथ सभी महिलाएं शिक्षा के महत्व को भी जाने। इसके लिए समय समय पर शिक्षा के क्षेत्र में भी कार्य किया जाता है। आर्थिक, सामाजिक दृष्टि से कितना प्रभाव पड़ा है? इसके बारे में उनका कहना है, काम को मिलते उचित दाम से सभी के अंदर आत्मविश्वास आ गया है। पहले जहां वह घर, परिवार की जिम्मेदारी को बमुश्किल उठा पाती थी, वहीं अब घर का खर्च निकालने के साथ अपने बच्चों को शिक्षा दिलवा रही हैं। मिलता है मेहनत को सम्मान इस काम में लगी महिलाओं को किस तरह से आर्थिक लाभ मिलता है? इसके बारे में माला बताती हैं, संस्था ने सभी महिलाओं को शेयर होल्डर बना दिया है। पूरे साल में बिक्री से जितनी कमाई होती है, उसे महिलाओं में बांट दिया जाता है। किसने कितना काम किया है? इसका पूरा लेखा - जोखा रखा जाता है। जो महिला जितना कार्य करती है, उसी हिसाब से उसका भुगतान होता है। इनके काम को ग्रामीण इलाके से निकाल कर शहरों तक लाने और लोगों तक सीधी पहुंच बनाने के लिए संस्था के स्तर पर एक और कोशिश की गयी है। इनके द्वारा बनाये गये सामान की बिक्री के लिए पटना शहर में एक आउटलेट भी खोला गया है। माला बताती हैं, अभी तक इसका बढ़िया परिणाम सामने आया है। आगे कुछ और भी आउटलेट खोलने की योजना है। लेखक: संदीप कुमार, वरिष्ठ पत्रकार। जूट की खेती से पाएं फायदा, देखिये यह विडियो