<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify;">परिचय</h3> <p style="text-align: justify;"><strong> </strong></p> <p style="text-align: justify;">मानव अधिकार और शिक्षा एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं। मानव अधिकारों को समाज में स्थापित करने के लिए यह जरूरी है कि मानवीय गरिमा और प्रतिष्ठा के बारे में जन-जागरूकता लाई जाए। जागरूकता और चेतना के लिए शिक्षा ही सर्वाधिक उपयुक्त साधन है इस दृष्टि से शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत ही मानावाधिकारों की शिक्षा भी शामिल है। यहाँ शिक्षा का उद्देश्य और उसका दायरा भी अत्यंत विस्तृत है। इसमें व्यक्तित्व का समग्र विकास सबसे महत्वपूर्ण है। जिसकी परिधि में बैद्धिक, मानसिक, नैतिक और <a href="../../../../../health/child-health/93694893693593e93593894d92593e-93693e93094093093f915-92a94793694092f-90f935902-93894d92893e92f93593f915-93593f91593e938/93693e93094093093f915-93593f91593e938">शारीरिक विकास</a> समाहित है। ऐसी शिक्षा ही समाज में शोषण और उत्पीड़न पर रोक लगाने में कारगर सिद्ध हो सकती है। इसी से संवेदना, सहिष्णुता और शांति का मार्ग प्रशस्त होगा। शिक्षा में सैद्धांतिक पहलुओं के साथ-साथ व्यावहारिक पहलू पर विशेष रूप से ध्यान देना होगा। तभी हम जीवन की उन कठोर सच्चाइयों से परिचित हो सकेंगे जिनकी जड़ गरीबी, शोषण और भेदभाव की मानसिकता में है। हमारा कर्तव्य है कि हम नौजवान पीढ़ी को अच्छी संस्कारों और गुणों से पोषित करें।</p> <h3 style="text-align: justify;">शिक्षा है मानव अधिकार का अनिवार्य अंग</h3> <p style="text-align: justify;">हम जानते हैं की मानव अधिकारों की शिक्षा, शिक्षा के अधिकार का एक अनिवार्य अंग है तथा हाल के मेसे एक मानव अधिकार के रूप में बड़े पैमाने पर मान्यता दी गई है। अपने तथा दूसरों के अधिकारों और आजादी के ज्ञान को मानवीय प्रतिष्ठा तथा सभी के अधिकारों के सम्मान की गारंटी का मुलभुत साधन माना जाता है। मानव अधिकारों की शिक्षा का मूल भाव यह है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रशिक्षित और व्यावसायिक कामगारों को ही तैयार करना नहीं है बल्कि समाज में परस्पर व्यवहार करने का कौशल रखने वाले व्यक्तियों का विस्कास करने में सहयोग देना भी है। मानव अधिकार शिक्षा का उदेश्य यह है कि विद्यार्थी एवं छात्र समाज में परिवर्तन लाने तथा समाज को साथ लेकर चलने की योग्यता विकसित करें। यह शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थियों को अच्छा नागरिक बना सके और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए पूरी क्षमता के साथ जुड़ सकें। शिक्षा ही लोगों को सशक्त करती है, उनके जीवन स्तर में सुधार लाती है तथा सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक नीतियों की निर्णयात्मक प्रकिया में भागीदारी के लिए उनकी क्षमता में बढ़ोतरी करती है। हमें ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए जिसमें शिक्षा मानव व्यक्तित्व के पूर्ण विकास तथा मानव अधिकारों और मुलभूत स्वंतत्रता के लिए आदर को सुदृढ़ करने पर केन्द्रित हो।</p> <h3 style="text-align: justify;">महात्मा गाँधी के मानव अधिकार पर विचार</h3> <p style="text-align: justify;">महात्मा गांधी ने कहा था कि यदि स्वंतत्रता प्राप्ति के बाद मूल्यों पर आधारित शिक्षा नहीं दी गई तो हमारे देश का भविष्य क्या होगा? उनके शब्द इस प्रकार है-</p> <p style="text-align: justify;">हमें याद रखना चाहिए लोग स्वंतत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद सुख-शान्ति की तलाश न करने लगे। जब हम स्वंतत्र हो जाते है तो चुनाव व्यवस्था की खामियां, अन्याय, अमीर वर्गों का आंतक तथा प्रशासन को चलाने का दायित्व भी हमारे सामने आना निश्चित है। लोग यह महसूस करने लगगें कि अंग्रेजी के राज में अधिक न्याय था, बेहतर प्रशासन था, शांति थी और स्वंतत्रता के बाद के दिनों की तुलना में पहले के प्रशासकों में बहुत अधिक ईमानदारी थी। यद्यपि स्वंतत्रता का केवल एक लाभ होगा कि हमें दासता से तथा उसके कारण होने वाले अपमान के कलंक से मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन, यदि शिक्षा का प्रसार होगा तो आशा बनी रहेगी। इसमें लोगों में अपने बाल्यकाल में शुद्ध आचरण, ईश्वर में विश्वास तथा प्रेम की विसेश्ताओं का विकास होता। स्वराज हमें केवल तभी ख़ुशी दे सकेगा यदि हम इस कार्य में सफलता प्राप्त करे लेंगे। अन्यथा, भारत, घोर अन्याय और शासकों के अत्याचार का घर बन जाएगा। इस सड़ी के महान व्यक्तियों के विचार, समुचित शिक्षा के अधिकार के महत्व पर प्रकाश डालते हैं।<strong> </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">शिक्षा में मानव अधिकार का उद्देश्य सुख-शान्ति प्राप्त करना है</h3> <p style="text-align: justify;">शिक्षा में मानव अधिकार का उद्देश्य सुख-शान्ति प्राप्त करना है। अतः इसे साक्षरता तक सिमित नहीं किया जाना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व का समग्र विकास यानि बौद्धिक, मानसिक, नैतिक एवं शारीरिक विकास करना है। व्यक्ति को समाज के लिए लाभदायक बनाना होना चाहिए। जब राष्ट्र या समाज पर्याप्त सख्या में इस प्रकार के व्यक्तियों को बनाने में सफलता प्राप्त करने में सक्षम हो पाता है, तभी सुख-शान्ति आ पाती है।</p> <p style="text-align: justify;">सुख-शांति यही है कि युवा चरित्रवान, विद्वान, दृढ़ तथा शक्तिशाली (नैतिक एवं शारीरिक रूप से) हों। तभी संपूर्ण जगत समृद्धि एवं वैभव से युक्त होगा। यह मानव की सुख-शांन्ति का मापदंड है।</p> <p style="text-align: justify;">यह अध्याय अत्यधिक शिक्षाप्रद है। यह घोषित करता है कि शिक्षा का अर्थ है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक सुख-शांन्ति और समृद्धि उचित शिक्षा, जो व्यक्तित्व का समग्र विकास करती है, के माध्यम से सुसज्जित ऐसे मानवों की संख्या के अनुरूप होती है, जो शारीरिक, बौद्धिक एवं नैतिक मनोबल से युक्त है।</p> <h3 style="text-align: justify;">लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का मानव अधिकारों पर प्रभाव</h3> <p style="text-align: justify;">औपनिवेशिक शासन से मुक्ति तथा लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाने के बाद भी, विश्व के अधिकतर भागों में , हमने मानवधिकारों का गंभीर उल्लंघन देखा है। इसका कारण है राष्ट्रवाद, जातिवाद, विदेशी-द्वेष, कामुकता और सांप्रदायिक असहिष्णुता। यह प्रवत्ति अत्यधिक घृणित रूपों में दिखाई देती है जिनमें महिलाओं अक बलात्कार, शोषण, बच्चों की अवहेलना एवं दुराचार तथा विदेशियों के प्रति तथा विदेशियों द्वारा, शरणार्थियों, विस्थापितों, अल्पसंख्यकों, स्थानीय लोगों, व्यक्तियों तथा अन्य कमजोर वर्गों पर सतत अत्याचार शामिल है। इसके अलावा नई-जैव चिकित्सा तकनीकों से तथा एचआईवी/एड्स से पर्यावर्णीय विक्रति का खतरा भी है।</p> <p style="text-align: justify;">मानव-अधिकारों के बढ़ते उल्लंघन को देखते हुए विशेषऔर पूर्वाभासी शैक्षिक नीतियों की जरूरत है ताकि हिसंक संघर्षों और संबंधित मानव अधिकारों के हनन को रोका जा सके। शिक्षा का उद्देश्य लोकतांत्रिक मूल्यों को पोषित करना, उनके लिए संवेदना उत्पन्न करना तथा मानव अधिकारों और लोकतंत्र पर आधारित सामाजिक परिवर्तन लाना होना चाहिए। मानव अधिकारों का प्रभावी प्रयोग, व्यक्तियों में समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना पर भी निर्भर है।</p> <h3 style="text-align: justify;">वियना में मानव अधिकार पर सम्मेलन</h3> <p style="text-align: justify;">मानव अधिकार संबधी विश्व सम्मेलन की वियना घोषणा में तथा कार्रवाई के कार्यक्रम में (धारा 1 विशेष पैरा 33 में) उल्लेख था कि मानव अधिकार शिक्षा, प्रशिक्षण तथा जन-सूचना, समुदायों के बीच मजबूत और सौहार्दपूर्ण संबंधों के संवर्धन एवं प्राप्ति के लिए और आपसी समझदारी, सहिष्णुता तथा शांति के लिए आवश्यक है। सम्मेलन में सिफारिश की गई थी कि राज्य को निरक्षरता के उन्मूलन के प्रयास अवश्य करने चाहिए और मानवीय व्यक्तियों के पूर्ण विकास की ओर तथा मानव अधिकार तथा मुलभूत स्वंतत्रता के लिए आदर की भावना को सुदृढ़ करने के लिए शिक्षा को निर्दशित करना चाहिए। इसने सभी राज्यों एवं संस्थानों से आह्ववान किया गया था कि वे मानव अधिकारों, मानवीय कानून, लोकतंत्र एवं कानून के शासन को, औपचारिक एवं अनौपचारिक सभी शैक्षणिक संस्थानों के पाठ्यक्रकों में विषयों के रूप में शामिल करें। विश्व सम्मेलन के सुझावों के अनुसरण में, संयुक्त राष्ट्र महासभा कने दिनाक 23.12.1994 की संकल्प संख्या 49/1904 के तहत 1.1.1995 से प्रांरभ होने वाली 10 वर्षीय योजना (मानव अधिकार शिक्षा के लिए यू.एन दशक) घोषणा की।</p> <h3 style="text-align: justify;">व्यक्ति तथा समूह में मानव अधिकार शिक्षा का महत्त्व</h3> <p style="text-align: justify;">व्यक्तियों तथा समूहों को मानव अधिकार शिक्षा देने का उद्देश्य यह है कि इससे मानव अधिकारों की अवमानना करने के दृष्टिकोण में परिवर्तन होगा, साथ ही, समाज की सोच भी बदलेगी। सभी मानव अधिकारों का आदर होगा उअर सभ्य समाज शांतिपूर्ण साझेदारी के आर्दश में रूपांतरित हो जाएगा। मानव अधिकारों के विषय में शिक्षा प्राप्त करना ही अपने-आप में काफी नहीं है बल्कि निश्चय ही मानव अधिकारों के हनन की समाप्ति तथा लोकतंत्र, विकास सहिष्णुता और आपसी आदर पर आधारित शान्ति की संस्कृति का निर्माण करने का एक साधन है। मुलभूत उद्देश्य, मानव अधिकारों की संस्कृति का निर्माण करना उअर लोकतांत्रिक समाज का विकास करना है जो प्रत्येक व्यक्ति और समूहों को अहिंसक एवं सौहार्दपूर्ण तरीकों का उपयोग करते हुए उनके भेड़ों एवं विवादों का समाधान करने में सक्षम बनाए। परिणामस्वरूप, प्रत्येक व्यक्ति द्वारा दूसरों के मानव अधिकारों का आदर करना समाज की संस्कृति बन जायेगी तथा विकसित समाज का मार्ग प्रशस्त होगा।</p> <p style="text-align: justify;">हमें हमेशा यह ध्यान में रखना होगा कि मानव अधिकारों का संरक्षण एवं संवर्धन मुलभूत उद्देश्य है तथा यह मनुष्य की भलाई के लिए है। समाज को सुग्राहीकरण की संपूर्ण प्रक्रिया से एवं मानव अधिकारों संबधी जागरूकता फैलाने से पूर्ण लाभ प्राप्त करना चाहिए। महाविद्यालय स्तर को प्रतिपादित करने समय हमने इस दृष्टि से भी ध्यान दिया है।</p> <p style="text-align: justify;">इस सन्दर्भ में, पाठ्यक्रम के एक भाग के रूप में क्षेत्रीय-दौरों तथा विभिन्न मानव अधिकार के विषयों जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, दलितों, जनजातियों, किसानों, महिलाओं, बच्चों आदि के बारे में कॉलेज स्तर के विद्यार्थियों द्वारा प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने पर बल दिया गया है। ये विषय विभिन्न करेंगे तथा उन्हें समाज के कमजोर वर्गों के समक्ष पेश आ रही गरीबी, शोषण, भेदभाव आदि जैसे जीवन की कठोर सच्चाइयों से सामना करने का अवसर मिलेगा। इस प्रकार के वास्तविक जीवन के अनुभव् छात्रों को मानव अधिकारों के सिद्धातों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने तथा उन्हें संवेदनशील बनाने में लंबे समय तक साथ देंगे। उनेक क्षेत्र –अध्ययन के परिणामों को समय-समय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू जी सी) के सामने रखना चाहिए। आयोग को उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित करनी चाहिए जो नोडल एंजेंसी के रूप में सहायता प्रदान करें। यह एजेंसी सभी अध्ययन रिपोर्टों को संकलित करके उनका विशेश्लेष्ण करे तथा ये रिपोर्ट सरकार को सौंपे, जो शासन की नीतियों के प्रतिपादन में अथवा कानून निर्माण या कानूनों की समीक्षा करने में आधारभूत सूचना का काम करेंगी। छात्रों द्वारा जिज्ञासावश की गई पूछताछ निष्पक्ष होगी और उत्तर देने वालों द्वारा दिए गए प्रत्युत्तर सच्चे होंगे तथा रिपोर्ट एक वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत पाएगी। ये रिपोर्ट सरकार के लिए नीतियों के प्रतिपादन में सहायक सामग्री होंगी। उदाहरण के लिए किसी खास राज्य में किसी विश्वविद्यालय विशेष के छात्रों को किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं का विषय सौंपा जा सकता है। छात्र उन क्षेत्रों का दौरा करेंगे जहाँ पर फसल की कटाई के मौसम से लेकर फसल की बिक्री तक अवधि के दौरान किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याएं अधिक थीं तथा उन तत्थों का अवलोकन करेंगे जिनके कारण उन्हें आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठान पड़ा।</p> <p style="text-align: justify;">विषय को दार्शनिक मोड़ देने के लिए भी मुझे क्षमाँ करें। सभी मनुष्य जन्मजात निष्कपट, ईमानदार, अनुरागी, दयालु और उदात्त होते हैं। जीवन की कठोर वास्तविकताएँ और परिस्थितियां कभी-कभी उन्हें उनके मूल चरित्र से पथभ्रष्ट कर देती है तथा अपने आप को जीवित और संपोषित रखने के लिए अवांछित गुणों और मार्गों को अपना लेते हैं। फिर इच्छा और लालच उन्हें घेर लेते हैं और जीवित रहने और संपोषित होने के लिए फिर प्रांरभ में अपनाए गये अवांछनीय गुण मनुष्य को उलझा देते हैं तथा मनुष्य अपनी इंद्रियों और अपने द्वारा सृजित भौतिक संसार का गुलाम बना जाता है। यह हमारा कर्त्तव्य है कि हम नौजवान पीढ़ी, जो इस समय स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण कर रही है, को अपने अंतनिर्हित अच्छे संस्कारों और गुणों की मूल प्रकृति से जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहित व प्रेरित करें। उन्हें इसके लिए साहस और शक्ति प्रदान करें तथा उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि जीवन में उनकी आपनी ख़ुशी, अपने बंधुजनों की ख़ुशी पर निर्भर है और यही मानव अधिकारों की आधारशिला भी है। यदि विद्यार्थियों को अपने बंधुजनों की जीवन की वास्तविक दयनीय स्थिति से अवगत कराया जाता है तो उनके ह्रदय का द्रवित होना स्वाभाविक है और जो उन्हें उनके जीवन में नजर आने वाले प्रत्येक गरीब, दलित व्यक्ति को निश्चित रूप से सहायता और समर्थन करने की शपथ लेने के लिए मजबूर करेगा। विद्यार्थियों को पंडित जवाहरलाल नेहरु के शब्दों का स्मरण कराना अनिवार्य है</p> <p style="text-align: justify;">हमारी पीढ़ी के महान लोगों की यही आकांक्षा रही है कि प्रत्येक व्यक्ति की आँख का आँसू पोंछा जाए। सम्भवतः यह हमारी ताकत से बाहर हो, परन्तु जब तक लोगों की आँखों में आँसू और पीड़ा है तब तक हमारा कार्य सम्पूर्ण नहीं होगा।</p> <p style="text-align: justify;">एक अन्य अज्ञात लेखक का ख़ुशी और अन्य लोगों की सेवा करने के सन्दर्भ में एक उद्धरण स्मरण आता है</p> <p style="text-align: justify;">ख़ुशी व्यक्तिगत वस्तु नहीं है। जब आप किसी व्यक्ति को राहत पहुँचाते है तो इससे उस व्यक्ति के चेहरे पर फिर से मुस्कान आती है, ऐसे में केवल वही व्यक्ति ही इससे लाभाविन्त नहीं होता है बल्कि इससे आपको भी लाभ होता है अर्थात आप भी उसकी ख़ुशी में भागीदार बनते हैं। सबसे बड़ी ख़ुशी हमें तब प्राप्त होती है जब हम दूसरों के कष्टों का निवारण करते हैं। इसलिए यदि हमें शान्ति में रहने की आदत है तो यह हमारी स्वाभाविक प्रकृति होगी कि हम मन में सेवाभाव रखें। शांतिपूर्ण वातावरण का आनन्द, उत्पीड़न से मुक्ति का आनन्द, चिंताओं से मुक्ति, भूख से मुक्ति ख़ुशी की ऐसी वास्तविक आधारशिलाएँ हैं जिनसे व्यक्ति पर सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरित होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">संयुक्त राष्ट्र का मानव अधिकारों को समर्थन</h3> <p style="text-align: justify;">संयुक्त राष्ट्र के एक सदस्य राज्य के रूप में, भारत, मानव अधिकार संधियों का अनुसमर्थन कर चुका है। इन संधियों अर्थात विश्व मानव अधिकार घोषणा-पत्र का अनुच्छेद 26(२) में मानव अधिकार शिक्षा का प्रावधान निहित है और इस प्रकार पाने द्वारा की गई इन संधियों के अंतर्गत, भारत जनता में मानव अधिकार शिक्षा, प्रशिक्षण और जन-सूचना का प्रसार करने के लिए बाध्य है।</p> <p style="text-align: justify;">संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार शिक्षा दशक के तत्वावधान में मानव अधिकार शिक्षा के संबंध में राष्ट्रीय कार्य-योजना का प्रारूप तैयार करने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा एक प्रारूप समिति गठित की गिया। इस समिति ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से मानव अधिकार शिक्षा पर राष्ट्रीय कार्य-योजना का प्रारूप तैयार करने का अनुरोध किया। यह कार्य वर्ष 2001 में पूरा कर दिया गया। राष्ट्रीय कार्य योजना निम्नलिखित बिंदुओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करती है।</p> <ul> <li>मानव अधिकारों के प्रति जन जागरूकता लाने के लिए कार्यनीति तैयार करना।</li> <li>मानसिक सोच में बदलाव लाकर एवं शिक्षा और प्रशिक्षण के माध्यम से मानव अधिकार संबंधी विशिष्ट लक्षित समूहों को सुग्राही बनाकर सामजिक सशक्तिकरण के संवर्धन हेतु कार्यनीति तैयार करना। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय, सरकारी अधिकारी जिनमें सेना अरु अन्य सशस्त्र बल, विशेष रूप से पुलिस, अर्ध- सैनिक बल और जेल अधिकारी, संसदीय सदस्य, कानून अधिकारी और न्यायिक अधिकारी भी शामिल है, कि विशिष्ट लक्षित समूह के रूप में पहचान की गई है।</li> </ul> <p style="text-align: justify;">मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धरा (छ) और (झ) आयोग को यह दायित्व सौंपता है कि वह मानव अधिकारों के क्षेत्र में अनुसन्धान करे और इसको बढ़ावा दे तथा समाज के विभिन्न वर्गों में मानव अधिकार शिक्षा का प्रसार करे और प्रकाशन, मिडिया, सेमीनार और अन्य उपलब्ध साधनों में माध्यम से इन अधिकारों के संरक्षण के लिए उपलब्ध उपायों के प्रति जागरूकता को बढ़ावा दे। इस कार्य के लिए सपूर्ण देश और इसके देशवासियों में मानव अधिकार संस्कृति पैदा करने की जरूरत है।</p> <h3 style="text-align: justify;">मानव अधिकार आयोग द्वारा लिए गए निर्णय</h3> <p style="text-align: justify;">पिछले 13 वर्षों में आयोग ने विशेष रूप से मानव अधिकार शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु कई कदम उठाए हैं। आयोग ने हमारे देश में मिट्टी में इसकी जड़ें गहराई तक ले जाने के लिए सर्वप्रथम हमारे समाज के तीन मुख्य क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया जिसमें राजनितिक दल, सभी स्तरों की कार्य्पाप्क प्राधिकारी, शिक्षाविद, अध्यापकों और छात्रों के लिए मानव अधिकार साक्षरता की जरूरत के अनुसार पाठ्यक्रकों का प्रबोधन करने वाले अधिकारी शामिल हैं।</p> <p style="text-align: justify;">स्कूल के विभिन्न स्तरों के लिए उचित रूप में पाठ्यक्रम तैयार करने हेतु आयोग ने शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण संस्थान (एन.सी.ई.आर.टी.) के साथ कई बैठकें की हैं।</p> <p style="text-align: justify;">आयोग ने सरकार से भी आग्रह किया है कि मानव अधिकार शिक्षा के महत्व पर उचित ध्यान दे। आयोग को प्राप्त सूचना के आधार पर सरकार ने मानव अधिकार पाठ्यक्रम को विश्वविद्यालयों में शुरू करने और मानव अधिकार शिक्षा संबंधी पाठ्य सामग्री किट तैयार करने पर कार्रवाई शुरू दी है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से प्राप्त वित्तीय सहायता से मानव अधिकार पर 35 विश्वविद्यालयों/कॉलेजों ने प्रमाण-पत्र, उपाधि-पत्र और स्नात्तकोत्तर पाठ्यक्रम शूरू कर दिए हैं।</p> <p style="text-align: justify;">जहाँ तक दूरवर्ती शिक्षा का प्रश्न है,आयोग को <a href="../../../../../aspirational-districts/झारखंड/खूंटी/अपने-जिले-से-जुड़ें/शिक्षा-विभाग">शिक्षा विभाग </a>द्वारा यह सूचना दी गई है कि माध्यमिक एवं उच्च स्तर पर समाज विज्ञान पाठ्यक्रम हेतु राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय द्वारा तैयार मोड्यूल में मानव अधिकार के विषय को भी रखा जा सकता है। आयोग ने इस संभावना का संभाव्य साधनों का प्रयोग किया जाना चाहिए। आयोग, दूरवर्ती शिक्षा कार्य प्रणाली का प्रयोग कर मानव अधिकार में कार्यक्रम शुरू करने के संबंध में इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से संपर्क बनाए हुए हैं।</p> <p style="text-align: justify;">राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थान (एन.आई.एच.आर.) को नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया युनिवर्सिटी, बेंगलुरु में स्थापित किया गया। आयोग ने राष्ट्रीय मानव अधिकार संस्थान में मानव अधिकारों पर एक चेयर की स्थापना की है और इस चेयर से संबंधित व्यय का भार वहन करने हेतु एक न्यास भी तैयार किया है।</p> <p style="text-align: justify;">सिविल सेवकों, पुलिस अधिकारियों, जेल अधिकारियों, न्यायिक अधिकारीयों, अर्ध सैनिक बलों और सशस्त्र सेना के अधिकारियों, शिक्षाविदों, गैर-सरकारी संगठनों और मानव अधिकार कार्यकर्त्ताओं के लिए निंरतर प्रशिक्षण कार्यक्रम/कार्यशालाएँ/ सेमीनार आयोजित किये जा रहे हैं।</p> <p style="text-align: justify;">आयोग हिंदी और अंग्रेजी में मासिक न्यूज लेटर, वार्षिक पत्रिका, वार्षिक रिपोर्ट और मानव अधिकारों से संबंधित विभिन्न विषयों पर नियम पुस्तकों, पुस्तिकाओं, सूचना पुस्तिकाओं (किट), पोस्टरों आदि का प्रकाशन भी करवाता है। इन प्रकाशनों का उद्देश्य मानव अधिकारों के संरक्षण और मानव गरिमा के संवर्धन से संबंधित नई सोच को पैदा करना है। मानव अधिकारों पर एक स्रोत पुस्तक (सोर्स बुक) का भी प्रकाशन किया है जिसका बाद में हिंदी और उर्दू में भी अनुवाद किया गया। लिंग, जाति, अशक्तता और धर्म पर आधारित भेदभाव नामक एक अन्य पुस्तिका का भी जनवरी 2003 में प्रकाशन किया गया जिसका मूल उद्देश्य अध्यापकों का सुग्राहीकरण करना था ।</p> <p style="text-align: justify;">वर्ष 2004 में मावन अधिकार के विभिन्न विषयों पर अपने अधिकार जाने, अंकमाला में आठ पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया गया। इनके व्यापक प्रसार हेतु इन्हें क्षेत्रीय भाषाओं में अनुदित किया गया है। वर्ष 2004 में अनुसूचित जातियों पर होने वाले अत्याचारों की एक रिपोर्ट अर्थात अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अत्याचार रोकथाम संबधी रिपोर्ट भी प्रकाशित की गई। आयोग ने 2005 में मानव अधिकार , अशक्तता और कानून नामक एक नियमावली का प्रकाशन करवाया। 10 दिसम्बर, 2005 को नौसिखियों के लिए मानव अधिकार शिक्षा नामक एक पुस्तिका का भी प्रकाशन किया गया।</p> <p style="text-align: justify;">आयोग ने स्कूली स्तर पर मानव अधिकार शिक्षा के स्तर का आकलन करने के उद्देश्य से स्कूली स्तर पर मानव अधिकार शिक्षा पर स्थिति दस्तावेज तैयार करने के लिए 2005 में एक अध्ययन करवाया। इन स्थिति दस्तावेजों का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या विभिन्न स्तरों पर मानव अधिकार शिक्षा मौजूदा स्कूली पाठ्यक्रम का एक अभिन्न हिस्सा है। इस अध्ययन से पता चलता है कि मानव अधिकारशिक्षा को एक अलग विषय के रूप में नहीं पढ़ाया जाता। बहरलाल, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद (एन,सी,ई,आर,टी,) और राज्य शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषदं (एस.सी.ई.आर,टी.) दिल्ली ने प्राथमिक स्तर से उच्च माध्यमिक स्तर तक के विभिन्न विषयों में मानव अधिकार अवधारणा को शामिल किया है।</p> <p style="text-align: justify;">आयोग ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में स्नातकोत्तर उपाधि-पत्र/स्नातकोत्तर उपाधि के लिए मानव अधिकार शिक्षा पर सामान्य पाठ्यक्रम तैयार करने का प्रयास किया है। इसके अतिरिक्त, यह महसूस किया गया है कि विश्वविद्यालय और कॉलेजों को उपाधि पत्र एवं <a href="../../../../../aspirational-districts/छत्तीसगढ़/कोंडागाँव/नागरिक-सेवाएँ/प्रमाण-पत्र">प्रमाण पत्र</a> पाठ्यक्रमों में एक सामान्य पाठ्यक्रम सामग्री तैयार करें की जरूरत है। यह महसूस किया गया है कि प्रसंविदा, संधियों और अभिसमयों के सन्दर्भ में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाया जा सेक जिससे कि वे केवल विदेशी विश्वविद्यालय में मानव अधिकार शिक्षा ग्रहण कर रहे विद्यार्थियों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा में आगे निकल सकें बल्कि प्रिशोषित पाठ्यक्रम में सभी सुगंत घटकों को शामिल कर मानव अधिकार शिक्षा ग्रहण करने के इच्छुक अन्तर्राष्ट्रीय विद्यार्थी समुदायों को भी आकर्षित कर सकें।</p> <p style="text-align: justify;">इस बात पर बल देने की आवश्यकता है कि राज्य मानव अधिकार आयोग राज्य महिला आयोग इत्यादि द्वारा मानवाधिकार प्रशिक्षण कार्यक्रमों/पाठ्यक्रमों को चलाया जाए जिससे पंचायती राज संस्थानों के कार्यकत्ताओं को लाभ मिल सेक ताकि पंचायती राज संस्थान गाँव लोगों के लिए अपने स्तर पर मानव अधिकार शिक्षा कार्यक्रम चला सकें।</p> <p style="text-align: justify;">देशभर में मानव अधिकार शिक्षा के प्रसार और जागरूकता फैलाने में आयोग के इस दिशा में किये गये प्रयासों में से एक प्रयास, स्कूली स्तर पर अध्यापनवृत्ति से जुड़े लोगों हेतु मानव अधिकारी शिक्षा कार्य प्रणाली और विश्वविद्यालय स्तर पर पाठ्यक्रम के संबंध में संस्तुतियाँ तैयार करना भी है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>लेखन : श्री वाई.भास्कर राव </strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong>स्त्रोत: </strong>राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, भारत</p> </div>