परिचय साहित्य के समान सिनेमा भी समाज का दर्पण है। ऐसे में सिनेमा में मानव अधिकारों की चर्चा होना स्वाभाविक है। समाज में विद्यमान प्रत्येक बड़ाई और मानवीय दृष्टि से क्रूर घटनाओं को फिल्मकारों ने बड़ी सहजता से पर्दे पर उतार कर फिल्मों को यथार्थता से जोड़ने का प्रयास किया है। ज्वलंत सामाजिक विषयों को पर्दे पर दिखाने का प्रयास का क्रम 1933 में शांताराम की फ़िल्म ‘अमर ज्योति’ से आरंभ होता है, जिसमें स्त्री-पुरुष के अधिकारों की समानता का मुद्दा उठाया गया था। इसी क्रम में इस परम्परा को आगे के निर्देशकों जैसे श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, ऋषिकेश मुखर्जी, प्रकाश झा आदि ने आगे बढ़ाया जो वर्तमान युग की ‘ट्रैफिक सिंग्नल’ ‘कॉर्पोरेट’ को पर्दे पर उतारने के दो कारण समाज के संदेश देने का प्रयास करते हैं। यह व्यक्ति विशेष से नहीं अपितु आम जनता को समग्र रूप से एक दिशा देने का प्रयास है। दूसरा कारण है कि जिन मानव अधिकारों का संरक्षण हम वास्तविक जीवन में नहीं देख पाते उन्हें पर्दे पर देखकर आम जनता वास्तविक जीवन में संभव करने की प्रेरणा एवं आशा महसूस करती है। सिनेमा है समाज का आईना सिनेमा को समाज में गूँजने वाली ध्वनियों की प्रतिध्वनी माना जाता है। रुपहले पर्दे की कहानी समाज के बीच से होकर ही निकलती है। ऐसे में सिनेमा में मानवाधिकारों की चर्चा होना लाजिमी है। भारत की विडंबना कहें या सामाजिक विसंगति ‘वसुधैव कुटंबकम’ व सर्वे भवन्तु सुखिन: की भावनाओं से ओत प्रोत यह देश मावनीय दृष्टि सेक्रूर घटनाओं से भरा पड़ा है। छुआछूत धार्मिक-जातिगत भेदभाव, सामन्तवाद, बालविवाह, सती प्रथा,भ्रष्टाचार जैसी तमाम बुराइयों को जड से उखाड़ फेंकने का दम भरने वाली प्रजातांत्रिक सरकारी मशीनरी होने के बावजूद आज 21 वीं सदी में भी इनसे मुक्ति नहीं मिली है। 1950 में संविधान के निर्माण व मानवाधिकारों की सूचि बनने में बाद भी आज आबादी के एक बड़े हिस्से को अपने अधिकारों की समुचित जानकारी उपलब्ध नहीं है। ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनकी तपिश में मानव अधिकार पिघलते रहे हैं। यहीं तपिश जब कुछ फिल्मकारों के जहन में बेचैनी पैदा करती है तो बैंडेट क्वीन, गंगाजल, वॉटर, ब्लैक, आक्रोश, निशांत, पार तमस, गर्म हवा, मम्मो, मैं जिन्दा हूँ, दो बीघा जमीन, दुनियां न माने, दो आँखे बारह हाथ, मदर इंडिया, मंडी, बाजार व मातृभूमि जैसी फिल्में हमारे सामने आती हैं, जो सामजिक परम्पराओं व आर्थिक सुधारों को ओट में आम आदमी के मानवीय अधिकारों के कत्ल की गवाह बनती हैं। चालीस के दशक से ही मानवाधिकारों की सुरक्षा व तत्कालीन परिस्थितियों को लेकर सिनेमा आवाजें उठा रहा है। वहीं शांताराम ने तो 1935 में अपनी फ़िल्म ‘अमर ज्योति’ के माध्यम से ‘स्त्री व पुरुष के अधिकारों की समनाता’ मुद्दा तब उठाया था जब संवैधानिक रूप से भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। सत्तर के दशक में जब फ्रांस के ‘न्यू वेब सिनेमा; की लहर भारत आई तो श्याम बेनेगल, गोविदं निहलानी, मणि कौल, एस,एस. स्थ्पू, ऋषिकेश मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य, गौतम घोष, बुद्धदेव दास गुप्त, अडूर गोपाल कृष्णन, प्रकाश झा, सई परांजपे व सुधीर मिश्रा जैसे निदेशक मानव जीवन की त्रासदियों वे उसके मूल अधिकारों के हनन की कहानी को बेबाकी से सिनेमा के पर्दे पे लेकर आये। मानव अधिकारों का सबसे पहला व मूल अधिकारों है ‘ जीने का अधिकार’ यानि मनुष्य का इच्छानुसार जीवन व्यतीत करने व उसके विकास का अधिकार। इसके अंतर्गत ‘कन्या भ्रूर्ण हत्या, गर्भपात, व इच्छा मृत्यु’ जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़े अधिकारों को शामिल किया गया है। हमारे समाज में कन्या को बोझ जाना जाता रहा है और पुत्र को ‘कुल दीपक’। हालांकि सूचना प्रसार व सुधारवादी आन्दोलन के चलते यह धारणा कम हुई है लेकिन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी (क) रीतियाँ विद्यमान हैं जिनके चलते कन्या के जन्मते ही विष देकर, सांस रोककर या दूध में डुबोकर खत्म कर दिया जाता है। इस विषय पर यूनेस्को की रिपोर्ट बताती है कि भारत में पिछले सौ सालों में तकरीबन 35 करोड़ भ्रूर्ण हत्याएं हुई हैं। इस रिपोर्ट को आधार बनाकर निर्देशक मनीषा झा ने ‘मातृभूमि-ए- नेशन विदाउट वोमेन’ का निर्माण किया था जो उस कड़वी सच्चाई की वीभ्त्सना को हमारे मन मस्तिष्क में उड़ेल देती है। मार्मिक कहानियों के जरिये होता है समाज की स्थिति का अवलोकन यह फ़िल्म एक ऐसे गाँव की कहानी है जहाँ कन्या के जन्म लेते ही उसे परंपरानुसार दूध से भरे पात्र में डुबो दिया जाता है। अब इस गाँव में एक भी स्त्री नहीं है। ऐसे में पास के गाँव में ‘कालकी’ नामक लड़की का पता चलता है। और फिर कालकी की शादी होती है, एक नहीं पांच भाइयों से और यहाँ से शुरू होता है पुरुष की बंद दैहिक वासनाओं के फूटने का सिलसिला। कुछ दृश्यों में तो कालकी ‘स्त्री’ न होकर ‘साधन’ मात्र बनकर रह जाती है। कालकी जब इस आमनवीय परिस्थिति से लड़ते-लड़ते टूट जाती है तो वह एक निम्न जाति के नौकर के जरिये वहाँ से भागने का प्रयास करती है लेकिन पकड़ी जाती है। यहाँ से दो जातियों के वर्चस्व की जंग शुर होती है जो उस पर कहर बनकर टूटती है। ‘गौशाला; में बंधी गाँव की एकमात्र स्त्री पर दोनों जातियों के लोग बारी-बारी से अपने पुरुषत्व की जोर आजमाइश करने आते हैं। पर्दे पर चलती यह फ़िल्म एक साथ कई सवाल हमारे लिए छोड़ जाती है। स्त्री के जन्म लेने का अधिकार, पुरुष समाज में उसके जीने का अधिकार, यौन जीवन की निजता व चुनाव का अधिकार, सभी अपनी निर्बलता की कहानी बयां करते हैं। श्याम बेनेगल की ‘हरी-भरी’ भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है जो स्त्री के यौन जीवन क प्रजनन संबधी अधिकारों पर खुलकर चर्चा करती है। संविधान में यह प्रावधान किया किया गया है कि प्रत्येक मनुष्य को पानी ‘जीविका उपार्जन की स्वतन्त्रता का अधिकार’ मिलना चाहिए। किसी भी तरह की बंधुआ मजदूरी, स्त्री-पुरुष में विभेद व कार्यस्थल पर यौन अतिक्रमण से सुरक्षा के अधिकार प्रत्येक नागरिक को दिए गये हैं। जीविका के अधिकार पर विमल राय की फ़िल्म ‘वो बीघा जमीन’ (1957) एक बेहतरीन उदाहरण है। शम्भू की अपनी दो बीघा जमीन उसकी जीविका का एकमात्र साधन है लेकिन साहूकार अनपढ़ शंभू से वह जमीन छीनना चाहता है। साहूकार के कर्ज के चुंगल से अपनी जमीन को बचाने के लिए शम्भु कोलकत्ता आ जाता है। पैसा कमाने के लिए यहाँ वह रिक्शा चलाने लगता है और अंत में एक धनी आदमी की प्रेमिका के रिक्शे का पीछा करते हुए शम्भू हादसे का शिकार हो जाता है। उसका एकमात्र सपना उसकी जमीन शम्भू से छीन ली जाती है। सामन्तवाद पर प्रहार करती यह फ़िल्म जीविका के प्रदत्त अधिकार व यथार्थ में उसे हासिल करने की जंग का प्रतिनिधित्व करती है। मधुर भंडाकर जैसे निर्देशक आज भी ‘ट्रैफिक सिग्नल’ व कॉपोरेट’ जैसी फिल्मों के जरिये इन मुद्दों को उठाते रहते अहिं। ‘ट्रैफिक सिग्नल’ जहाँ लाल बत्ती पर होने वाले रोजगार व उससे जुड़े लोगों के जोवन की परतें खोलती है वहीं ‘कॉर्पोरेट’ हाई सोसायटी के बिजनेस के तौर तरीकों के बीच स्त्री की स्थिति व् उसके ‘यूज’ होने की कहानी कहती है। रोटी, कपड़ा और मकान आम आदमी की मुलभुत आवश्यकताएँ हैं जिन्हें संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (1948) में भी शामिल किया गया है और भारतीय संविधान में भी। लेकिन अधिकारों की घोषणा मात्र करने से उनकी सार्थकता सिद्ध नहीं होती। इस यथार्थ की पुष्टि सिनेमा ‘अशनि संकेत’ (सत्यजीत रे). ‘अकालेन संधाने’ (रित्विक घटक), ‘मदर इंडिया’ (महबूब) जैसी फ़िल्मकृतियों के माध्यम से करता है, जो अकाल व भूख में तड़पते लाखों मनुष्यों के लाचारों पर जमींदारों, साहूकारों व राजनैतिक गठजोड़ों की तफ्तीश करती है। मनुष्य जन्म से अपराधी नहीं होता बल्कि परस्थितियाँ उसके अपराधी बनने के लिए जिम्मेदार होती है। इसलिए मावन अधिकारों का हनन करने वाले अपराधी भी मानवता की कसौटी पर पाने ‘मावनीय अधिकारों’ का लाभ उठा सकते हैं। अंडर ट्रायल केसों मने होने वाली अमाव्नीय क्रूरता से सुरक्षा के उपाय संविधान में किये गये हैं। अपराधियों के जीवन पर वही शांताराम ने 1957 में ‘दो आँखे बारह हाथ’ का निर्माण किया था जिसमें एक जेलर छह कैदियों को गांधीवादी आर्दश ‘पाप से घृणा करो पापी से नहीं’ के माध्यम से सुधारने का संकल्प लेता है। ऐसा ही प्रयास वास्तविक जीवन में करने वाली ‘किरण बेदी’ को मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। अपराधियों को पानी सुरक्षा के अधिकार न दिया जाएं तो स्थिति कितनी भयानक हो सकती है इसकी बानगी प्रकाश झा की फ़िल्म ‘गंगाजल’ में दिखने को मिलती है जो 1980 में बिहार की भागलपुर जेल में घटित ‘अंखफोड़वा कांड’ की सच्ची घटना पर आधारित है। इससे जेल में बंद कैदियों को निजी रंजिश के चलते आँखों में तेजाब डालकर अँधा कर दिया गया था। संविधान प्रत्येक मनुष्य को ऐसे किसी भी अमानवीय कृत्य से सुरक्षा के अधिकार सुनिश्चित करता है। मानव अधिकारों की कड़ी में एक और महत्वपूर्ण अधिकार है जिस पर सिनेमा में काफी ज्यादा काम हुआ है यह है ‘धर्म की आजादी का अधिकार’। किसी भी व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका प्रचार प्रसार करने व उसके संरक्षण का अधिकार है। यह पूर्णतया व्यक्तिगत विषय है। भारत में तकरीबन 80% हिन्दू, 12% मुसलमान, २.1% सिख, 1.8% इसाई व 6% बौद्ध हैं। इस बहुधर्मी देश में यह अधिकार तब और प्रासंगिक हो जाता है जब हम इसके अतीत पर नजर डालते हैं। बंटवारे के बाद हिन्दू-मुसलमान के बीच अविश्वास का जो बीज पनपा था उसका फल आज तक भोग रहे हैं। 1992 में बाबरी मजिस्द क्विंस, 1993 में हुए मुंबई बम धमाके व अभी गुजरात में हुआ गोधरा काण्ड जैसे हादसे धर्म के नाम हुई लाखों बेगुनाह मौतों के चशमदीद गवाह हैं। सिनेमा ने धर्म से जुड़े आम आदमी के अधिकारों को ’1947 अर्थ, मम्मो, गर्महवा, तमस, व् पिंजर के जरिये सशक्त रूप से उठाया है। एक तरफ अनुराग कश्यप की ‘ब्लैक फ्राईडे ‘ है जो मुंबई बम धमाकों का खुला दस्तावेज है तो दूसरी तरफ राहुल ढोलकिया की ‘परजानियाँ’ है जो गोधरा काण्ड के दौरान एक पारसी परिवार की त्रासदी की सच्ची घटना पर बनी है। जब धार्मिक उन्माद अपने चरम पर होता है तो मानव अधिकारों की दीवारें रेत की तरह ढह जाती है। ये फिल्में धर्म के नाम पर अधिकारों के इस खोखलेपन के उजागर करती हैं सभी समाज के ठेकेदारों को धर्म से जुड़े मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत व बेहतर विकल्प तलाशने का संकेत भी करती है। संविधान में 73 वें संसोधन के जरिए यह व्वयस्था की गयी थी कि ‘दलितों व् महिलाओं को राजनितिक में बराबर की हिस्सेदारी’ हासिल हो सके। इसके तहत पंचायत चुनाव में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी गयी हैं इस विषयपट बंगाली निदेशक अनन्या चटर्जी ने 2003 में ‘द्वितीय पक्ष’ नाम से फ़िल्म का निर्माण किया था, जिसमें सरकारी प्रावधान के चलते श्यामा को ग्राम प्रधान बनने क अवसर मिलता है। जिसमें सरकारी प्रावधान के चलते श्यामा को ग्राम प्रधान बनने का अवसर मिलता है। फ़िल्म श्यामा में अपने ससुर के हाथों की कठपुतली होने से लेकर अपने वास्तविक अधिकारों को हासिल करने की कहानी है। वास्तव में आज भी समाज ने सदियों तक अपने अधिकारों से वंचित नारी व दलित को दिए गये संवैधानिक अधिकारों को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया है। इसका जीता जागता छतीसगढ़ क्र रायगढ़ जिले में देखने को मिलता है जहाँ लता साहू नामक निम्न जाति की महिला जब पंचायत चुनाव में यादव जाति की महिला उम्मीदवार के सामने खड़ी जो जाती है तब उसे उसकी ‘गलती’ का सबक सिखाने के लिए सारे गाँव में नग्न करके घुमाया जाता है और बेईज्जत किया जाता है। मानव अधिकारों की व्यवस्था करके ‘प्रत्येक मनुष्य के लिए लिए विकास के समान अवसरों की उपलब्धता का जो बीज डाला गया है उसके फल तब तक मीठे नहीं होंगे तब तक मीठे नहीं होंगे जब तक बीज के सुनिश्चचित व सुरक्षित अंकुरण की व्यवस्था नहीं की जाएगी। लेखन : हेमंत राज पटेल स्रोत: मानव अधिकार आयोग, भारत सरकार