प्रस्तावना आर्थिक या अन्य अयोग्यताओं के कारण किसी भी नागरिक को न्याय प्राप्त करने से वंचित नहीं किया जा सकता। समाज के प्रत्येक कमजोर वर्ग को मुफ्त एवं उचित कानूनी सेवाएं प्रदान करने के लिए विधिक सेवाऐं प्राधिकरण अधिनियम, 1987 बनाया गया है, जिसके अन्तर्गत राज्य विधिक सेवाएँ प्राधिकरण का गठन किया गया है। न्याय केवल न्यायालयों में लंबित वादों तक सीमित नहीं है। कानूनी जागरूकता व साक्षरता, विधिक सहायता के स्तम्भ है। हरियाणा राज्य विधिक सेवाऐं प्राधिकरण (हालसा) कानूनी जागरूकता व साक्षरता के लिए प्रयासरत है। हालसा द्वारा राज्य के विभिन्न गांवों में विधिक सहायता क्लीनिक स्थापित किये गये हैं, जिनमें पराविधिक स्वयं सेवक व पैनल के वकील विधिक सहायता प्रदान करते हैं। घरेलू सम्बन्धों को निभाने के लिए कुछ कानूनी जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं। पत्नी, नाबालिग बच्चे, अविवाहित बेटी, वृद्ध माता-पिता और विधवा बहू का भरण पोषण का हक विभिन्न कानूनों द्वारा सुरक्षित है। भरण-पोषण में भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और चिकित्सा उपचार के प्रावधान शामिल हैं। एक अविवाहित पुत्री को उसकी शादी के लिए उचित खर्चे का भी अधिकार है। जो व्यक्ति भरण-पोषण का जिम्मेदार है, अगर उसकी मृत्यु हो जाती है, तो दावेदार, उसके आश्रित बन जाते है, चाहे वह माता, पिता, विधवा बहू (जिसने दुबारा शादी नहीं की है), अविवाहित पुत्री अथवा विधवा पुत्री हो। (जहां तक वह अपने पति, पुत्र या ससुर की सम्पत्ति से भरण-पोषण नहीं पा सकती)। भरण-पोषण का क्लेम तब उठता है जब भरण-पोषण का जिम्मेदार व्यक्ति अपने कर्तव्यों से विमुख या उनका उल्लंघन करता है। एक भारतीय परिवार की सामान्य आर्थिक व सामाजिक सेटिंग में पुरूष सदस्य अपने परिवार का मुखिया होता है जो अपने परिवार के लिए जीविकोपार्जन करता है और अपने परिवार के अन्य सदस्यों का पोषण करता है। यह भी कानूनी तौर पर सम्भव है कि पत्नी अपने पति का भरण-पोषण करे अगर वह आर्थिक तौर से उस पर निर्भर है। घरेलू जीवन में बिना किसी औपचारिक मांग के अधिकारों की पूर्ति होती रहती है। मांग और हस्थानांतरण का मुद्दा तब उठता है जब उदाहरण के तौर पर पति ने पत्नी का परित्याग कर दिया हो या उसके साथ क्रूरता का व्यवहार करता हो और इस प्रकार उसे अलग रहने के लिए मजबूर कर दिया हो या पति ने दूसरी शादी कर ली हो या किसी रखेल के साथ रहता हो और अगर पति किसी संक्रामक रोग से पीड़ित हो या उसने धर्म परिवर्तन कर लिया हो, तब भी पत्नी का पति से अलग रहना उचित माना जाता है और उसका भरण-पोषण का अधिकार बना रहता है। “घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत औपचारिक शादी के बिना भी यदि औरत का किसी आदमी के साथ शादीनुमा रिश्ता है तो वह औरत भरण-पोषण की हकदार है। एक नाजायज नाबालिग बच्चा अपने माता व पिता के द्वारा भरण-पोषण का हकदार है। एक तलाकशुदा पत्नी भी भरण-पोषण की हकदार है यदि उसने दुबारा शादी नहीं की है। मुस्लिम महिलाओं के मामले में सामान्य रूप से भरण पोषण का क्लेम ईदत की अवधि के दौरान ही होता है। एक फौजदारी अदालत के समक्ष भरण पोषण के मामले में अगर मुस्लिम पति फौजदारी अदालत के अधिकार क्षेत्र का विरोध करता है तो पत्नी का क्लेम राज्य वक्फ बोर्ड तय करेगा और भुगतान करेगा। डैनियल लतीफ (2001) और शबाना बानो (2009) के मुकदमों में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि एक तलाकशुदा मुस्लिम पत्नी ईदत के अवधि के दौरान भी भरण पोषण की हकदार है, अगर उसने दुबारा शादी नहीं कर ली। भरण पोषण की राशि पक्षों कि हैसियत और हालात पर निर्भर करती है और दावेदार की उचित जरूरते, उसका अलग रहने का औचित्य, उसके आर्थिक साधन, और उन व्यक्तियों की संख्या जो प्रतिवादी पर भरण-पोषण के लिये निर्भर हैं। साधारणतया भरण-पोषण के मामले में जो व्यक्ति भरण-पोषण के लिए बाध्य है, उसके शुद्ध वेतन में से लगभग 20-25% का दावेदार है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की याचिका न्यायिक अधिकारी के समक्ष दायर की जा सकती है। जहां पारिवारिक अदालतों की स्थापना की जा चुकी है वहां इस प्रकार की याचिकायें उन अदालतों में दायर की जा सकती हैं। आवश्यक न्यायालय शुल्क का भुगतान करके दीवानी दावा भी दायर किया जा सकता है। दीवानी कार्यवाही के दौरान प्रतिवादी की सम्पति कुर्क भी कराई जा सकती है। भरण-पोषण का अधिकार भरण-पोषण के लिये जिम्मेदार व्यक्ति की सम्पति के खरीददार के विरूद्ध भी लागू किया जा सकता है। जब खरीददार को इस क्लेम का नोटिस था या जब यह हस्थानांतरण बिना किसी लेन-देन का हुआ हो। भरण-पोषण के आदेश की पालना के लिये बाध्य व्यक्ति को गिरफतार भी किया जा सकता है और उसका वेतन और सम्पति भी कुर्क की जा सकती है। वर्ष 2007 में एक नया अधिनियम का गठन किया गया है, जिसके अन्तर्गत माता-पिता जिनकी अनदेखी हो और सन्तानहीन वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण का प्रावधान किया गया हो। इस अधिनियम के तहत गठित न्यायालय के समक्ष याचिका दायर करने की तिथि से 90 दिनों के भीतर राहत दिलवाने का प्रावधान है। इन वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा स्वैच्छिक संगठनों द्वारा भी की जा सकती है। न्यायाधिकरण दावे को मध्यस्थता के लिए भी भेज सकता है या स्वयं निर्णय कर सकता है और न्यायाधीश को भरण-पोषण के लिये 10,000/- रूपये प्रति माह तक अनुदान देने का अधिकार है। दंड प्रक्रिया संहिता (धारा 125) इस कानून के तहत भरण-पोषण पाने का हकदार कौन-कौन है - भरण-पोषण किस व्यक्ति से माँगा जा सकता है - पत्नी पति नाबालिग बच्चे पिता मानसिक व शारीरिक अपंगता वाले बच्चे पिता माता-पिता जो आर्थिक तौर पर असमर्थ है पुत्र भरण-पोषण राशि (रूपये) निश्चित करने के लिए अदालत किन-किन कारणों को ध्यान में रखती है – भरण-पोषण देने और माँगने वाले दोनों की आय और दूसरी संपत्तियां भरण-पोषण देने और मांगने वाले दोनों की कमाई के साधन भरण-पोषण मांगने वाले की उचित जरूरतें यदि दोनों अलग रह रहे हैं तो उसके उचित कारण भरण-पोषण मांगने वाले उचित हकदारों की संख्या वह पत्नी भरण-पोषण माँगने की हकदार नहीं है जो परगमन में रह रही हो या वह बिना किसी पर्याप्त कारण के अपने पति के साथ रहने को इन्कार करती है। या आपसी समझौते से अलग रह रही हो। धारा 125 Cr.PC के अन्तर्गत भरण-पोषण मांगने वाला अपना केस कहाँ दायर कर सकता है - उस जिला के मैजिस्ट्रेट के पास जहाँ वह व्यक्ति जिस के खिलाफ कार्यवाही की जानी है - (क) रहता है, या - (ख) जहाँ वह या उसकी पत्नी रहते हैं, या - (ग) जहाँ वह अपनी पत्नी के साथ पहले रहता था/या नाजायज औलाद की माता के साथ रहता था। क्या दूसरी पली भरण-पोषण का दावा कर सकती है? दूसरा विवाह अमान्य होता है, इसलिए दूसरी पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार नहीं होता। किन्तु ऐसे विवाह से जन्मे बच्चों को भरण-पोषण का अधिकार है। क्या काम करने वाली महिला भरण-पोषण का दावा कर सकती है? पत्नी कमाई करती है, इस तथ्य पर भरण-पोषण को मना नहीं किया जा सकता। फिर भी भरण-पोषण देने के समय जज द्वारा इस तथ्य पर विचार किया जा सकता है। क्या एक तलाकशुदा पनी भरण-पोषण का दावा कर सकती है? एक तलाकशुदा पत्नी भरण-पोषण का दावा कर सकती है जब तक कि वह दूसरा विवाह नहीं करती। तलाकशुदा पत्नी वह भी हो सकती है जिसने आपसी सहमति से तलाक लिया है। किस दिनांक से आदेश परिचलित होता है? अर्जी की दिनांक या आदेश (धारा 125(2) Cr.PC) की दिनांक से यह प्रचलित होता है। क्या धारा 125 Cr.P.C. के अन्तर्गत एक मुस्लिम महिला भरण-पोषण का दावा कर सकती है? माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने शबाना बानो मुकद्दमें में तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भरण-पोषण का अधिकार दिया था। परन्तु बाद में भारत सरकार ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को विशेष कानून बनाकर रद्द कर दिया। इस नए कानून के तहत, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अन्तर्गत मुस्लिम पत्नी द्वारा भरण-पोषण से सम्बन्धित याचिका की सुनवाई के दौरान पति अपराधिक न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दे सकता है। इस प्रकार के भरण-पोषण के मामलों का निपटारा मुस्लिम महिला (तलाक से सम्बन्धित अधिकार का संरक्षण) अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार किया जाता है। धारा 125 CrPC के अन्तर्गत भरण-पोषण का आदेश कैसे लागू किया जाता है? धारा 125(3) के तहत यदि कोई आदमी पर्याप्त कारणों के रहित भरण-पोषण देने से इन्कार करता है और अदालत के आदेश का उल्लंघन करता है तो मैजिस्ट्रेट उस पैसे की वसूली के लिए वारंट जारी कर सकता है और यदि उस आदमी ने वारंट जारी होने के बाद पूरा या प्रत्येक माह का भता न दिया तो उसे सजा हो सकती है। जो कि एक माह तक हो सकती है या जब तक वह भत्ता नहीं देता। धारा 125 के तहत यदि कोई प्रार्थना पत्र लंबित है तो क्या अंतरिम भरण-पोषण देने का प्रावधान है? मैजिस्ट्रेट याचिका लंबित होने के दौरान भरण-पोषण देने के लिए अंतरिम आदेश पास कर सकता है। यदि कोई आदमी भरण-पोषण के आदेश से संतुष्ट नहीं है तो उसका क्या उपाय है? पीड़ित पक्ष उस न्यायालय के आदेश के खिलाफ सत्र न्यायालय में पुनर्याचिका दायर कर सकता है और यह पुनर्याचिका अंतरिम भरण-पोषण के आदेश के खिलाफ भी डाली जा सकती है। हिन्दू दत्तक और भरण-पोषण कानून, 1950 (धारा 18-23) इस कानून के तहत भरण-पोषण पाने का हकदार कौन-कौन है - भरण-पोषण किस व्यक्ति से माँगा जा सकता है - पत्नी (धारा 18) पति से विधवा बहू (धारा 19) ससुर से नाबालिग (धारा 20) माता-पिता से वृद्ध और कमजोर माता-पिता (धारा 20) पुत्र/पुत्री से मृतकों के आश्रित (धारा 22) मृतकों के उत्तराधिकारियों से भरण-पोषण राशि (रूपये) निश्चित करने के लिए अदालत किन-किन कारणों को ध्यान में रखती है – भरण-पोषण देने और मांगने वाले दोनों की कमाई के साधन भरण-पोषण मांगने वाले की उचित जरूरतें भरण-पोषण देने और पाने वाले दोनों के अलग-अलग रहने के मुख्य कारण भरण-पोषण मांगने वाले की आय और उसकी दूसरी संपत्ति भरण-पोषण मांगने वाले उचित हकदारों की संख्या मृतक के आश्रितों के लिए भरण-पोषण राशि (रूपये) निश्चित करने के लिए अदालत किन-किन कारणों को ध्यान में रखती है – कर्जा चुकता करने के बाद मृतक की संपत्ति की कीमत आश्रित के लिए वसीयत में बनाया गया कोई नियम मृतक से रिश्ते की डिग्री आश्रित की उचित जरूरतें आश्रित की आय और अन्य संपति भरण-पोषण मांगने वाले उचित हकदारों की संख्या भरण-पोषण मांगने वाला अपना केस कहाँ दाखिल कर सकता है - भरण-पोषण मांगने वाला अपने क्षेत्र के नगरीय न्यायिक न्यायधीश, वरिष्ठ श्रेणी, की अदालत में केस दाखिल कर सकता है। हिन्दू विवाह कानून, 1955 (धारा 24 और 25) इस कानून के तहत भरण-पोषण पाने का हकदार कौन-कौन है - भरण-पोषण किस व्यक्ति से माँगा जा सकता है - पति पत्नी से पत्नी पति से भरण-पोषण राशि (रूपये) निश्चित करने के लिए अदालत किन-किन कारणों को ध्यान में रखती है – भरण-पोषण देने और माँगने वाले दोनों की आय और अन्य संपत्तियाँ दोनों का व्यवहार केस की अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर भरण-पोषण का आदेश बदला या समाप्त किया जा सकता है, यदि जिसके हक मे धारा 25 के अन्तर्गत फैसला किया गया है, वह दोबारा विवाह करता है, या यदि वह पक्ष पत्नी है और वह पतिव्रता नहीं रह गई है, या, यदि वह पक्ष पति है और उसने वैवाहिक जीवन के बाहर किसी दूसरी स्त्री के साथ संभोग किया है। भरण-पोषण मांगने वाला अपना केस कहाँ दायर कर सकता है - उस क्षेत्र की जिला अदालत में जिस की स्थानीय सीमाओं में विवाह हुआ था, या प्रतिवादी रहता हो, या दोनों पक्ष जहां साथ रहते थे, या जहाँ पत्नी याचिकाकर्ता है - जहाँ वह याचिका की प्रस्तुति के दिन रह रही है। घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण कानून, 2005 (धारा 20) इस कानून के तहत भरण-पोषण पाने का हकदार कौन-कौन है - भरण-पोषण किस व्यक्ति से माँगा। जा सकता है - घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला और उसके बच्चे प्रतिवादी वयस्क पुरूष जिसके साथ पीड़ित महिला, सहभाजी घर में रह रही है या रहती थी भरण-पोषण राशि (रूपये) निश्चित करने के लिए अदालत किन-किन कारणों को ध्यान में रखती है - भरण-पोषण देने और माँगने वाले दोनों की आय और अन्य संपत्तियाँ दोनों का व्यवहार केस की अन्य परिस्थितियाँ भरण-पोषण मांगने वाला अपना केस कहाँ दायर कर सकता है – प्रथम वर्गीय मैजिस्ट्रेट के पास जो उस क्षेत्राधिकार (जगह) में कार्यरत हो जहाँ पीड़ित अस्थाई रूप से रहती हो या प्रतिवादी रहता हो या जिस क्षेत्र में घरेलू हिंसा के आरोप दर्ज किए गए हों। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के लिए भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 इस कानून के तहत भरण-पोषण पाने का हकदार कौन-कौन है - भरण-पोषण किस व्यक्ति से माँगा जा सकता है - वरिष्ठ नागरिक, जैसे, (क) माता-पिता या दादा-दादी वादी के, एक या एक से अधिक बच्चों से जो नाबालिग नहीं हैं। (ख) नि:संतान वरिष्ठ नागरिक उस रिश्तेदार से जो नाबालिग नहीं है और जिसके कब्जे में वादी की सम्पति है या वादी की मृत्यु के बाद उसकी संपति का उतराधिकारी है। इस अधिनियम के तहत कितनी भरण-पोषण राशि दी जा सकती हैं – इस कानून के तहत राज्य सरकार द्वारा निर्धारित अधिकतम भरण-पोषण राशि 10,000/- रूपये प्रति माह से अधिक नहीं होगी। भरण-पोषण राशि (रूपये) निश्चित करने के लिए अदालत किन-किन कारणों को ध्यान में रखती है - भरण-पोषण देने और माँगने वाले दोनों की आय और अन्य संपत्तियाँ दोनों का व्यवहार केस की अन्य परिस्थितियाँ भरण-पोषण मांगने वाला अपना केस कहाँ दायर कर सकता है – धारा 7 के अन्तर्गत गठित भरण-पोषण अधिकरण के पास जिसका अध्यक्ष उपमण्डल मैजिस्ट्रेट होता है। स्त्रोत: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार