स्वतंत्रता का मंत्र – वंदे मातरम् —-------------------------—----------------------------------------------------------- निःसंदेह स्वतंत्रता हम सबका लक्ष्य है, तो वंदे मातरम् जय-घोष। समर्पण जहाँ सहनशीलता को जन्म देता है, वहीं स्वतंत्रता सफलता को। आकांक्षा और महत्वाकांक्षा से निर्मित मानव सभ्यता में हम सब स्वतंत्रता की ही खोज में लगे रहते हैं। स्वतंत्रता निजी भी है और प्राकृतिक भी। सूर्य के आभा से सुसज्जित विशाल महासागर का जय घोष अगर उसकी लहरो की ध्वनि में है तो निजी स्तर पर मेरा और आपका जय-घोष वंदे मातरम् ही है। समयानुसार हर युग में स्वतंत्रता को परिभाषित किया गया। आज का भारत 1947 से हर वर्ष 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाता है। सनातन-धर्म कहता है की सफलता में पूर्व कई जन्म का संचित कर्मों का योगदान उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना की मेरे और आपके इस जन्म के कर्म का। समस्या यह है कि हमारा नियंत्रण केवल आज के कर्मों पर ही है। जहाँ नियंत्रण नहीं होता वहाँ समर्पण स्वयं ही जन्म लेता है। समर्पण की अवस्था में ही हम अपनी जरूरतों के साक्षी बनते हैं। यही से हम यह निर्धारित करते है की हम स्वतंत्र है की पराधीन। मानवता प्रधान भारत की सभ्यता को वस्तुतः चार चरणों में समझा जा सकता है। कई दर्शन शास्त्र इसे सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलयुग के रूप में मानते है। सतयुग में ही मंत्रो का आविष्कार हुआ। मंत्र सामूहिक जन कल्याण की धारणा और स्तुति होती है जो विश्व कल्याण के लिए होती है। यह निजी स्तर पर भी उतनी ही लाभकारी होती है जितनी प्राकृतिक स्तर पर। हमारे महर्षि लोगो ने मंत्रो की शक्ति को आदि काल से पहचाना और द्वन्द ध्वनि, जो भविष्य के संकट हो सकते थे उन्हें चिन्हित करके उसका उपचार किया। मंत्र कुछ और नहीं बल्कि यह वह अमर ध्वनि है जिससे द्वंद्व ध्वनियाँ नष्ट हो जाती हैं। इन्हे सुर ही कहिये, जिन्हें धर्मग्रंथों में देव भी कहा गया है, या आप इसे अंग्रेजी में साउंड इंजीनियरिंग या सॉर्टिंग और इंडेक्सिंग ऑफ़ साउंड भी कह सकते है। युग श्रेष्ठ भारत युगों तक विश्व विजयी रहा किन्तु कलयुग में 11 वि से 20 वि शताब्दी तक उसने अपने आप को पराधीन बताया। भारत के इतिहास ने मुस्लिम और अंग्रेजी शासन को इसके लिए जिम्मेदार माना। विद्वता अगर अपने ही आकर्षण में कैद हो जाए तो बड़ी विचित्र परिस्थिति को जन्म देती है। आपसी विवाद से हमने अपने शासन और संपत्ति दोनों को ही हानि पहुँचाई। समय एक सा कभी नहीं रहता और इसी क्रम में 14वीं से 17वीं शताब्दी में विश्व चेतना का पुनर्जागरण हुआ। यूरोप में मशीन का आविष्कार हुआ और वह समृद्ध और शक्तिशाली बना। अमेरिका के प्रजातंत्र से समूचे विश्व को संविधान मिला जो आम लोगो द्वारा निर्मित, प्रेरणा का एक शक्तिशाली स्त्रोत बना। रूस और चीन ने अपनी बेहद कठिन भौगोलिक स्थिति देखते हुए साम्यवाद को अपनाया। इसी दौर में 19 वी सदी के अंत में भारत में भी स्वतंत्रता की गजब लहर चली। महामहिम बंकिमचंद्र ने भी प्राचीन महाऋषियों के तर्ज पर मंत्रो को कविता में संग्रह किया। उनका विश्व प्रसिद्ध लेख वंदे मातरम्, जो आज हमारा राष्ट्रीय गीत है वह और कुछ नहीं बल्कि एक स्तुति है, शक्ति की, देवी की, भावना की, मेरे और आपके समर्पण और स्वतंत्रता की। हमारे संचित कर्म के दो ही लक्ष्य हो सकते हैं, भारत देश की संप्रभुता और विश्व की मानवता। यद्यपि सुर और असुर का द्वंद्व सतयुग में भी था, आज भी है और जब तक प्रकृति है तब तक यह द्वंद्व रहेगा। सेना की सफलता सेनापति से है, शक्ति का केंद्र एक ही परम चेतना है, विद्वत्ता मेरा और आपका संचित कर्मों का योग से है और स्वतंत्रता का मंत्र – वंदे मातरम् ही है। जय हिन्द - भुवनेश झा