परिचय वित्त एक साधन भी है और साध्य भी। साधन के रूप में यह सभी साधनों से अधिक महत्वपूर्ण बन गया है। साध्य के रूप में हर सफलता को वित्त के ही मापदंड पर देखा जा रहा है। पंचायत राज में वित्त साधन एंव साध्य दोनों रूपों में गौण है और यही वह कड़ी है जिसे हम जितना मजबूत बनायेंगें पंचायत राज संस्था उतनी ही सफल एवं प्रभावकारी बनती जायेगी। सरकार इस ओर सतत प्रयत्नशील है। वित्त दो तरह हो सकता है: किसी स्रोत से एकमुश्त सहायता प्राप्त करने से और पानी बुद्धि-विवेक और श्रम से उगाही करके। इन दोनों में दूसरा विकल्प अधिक श्रेयस्कर होता है क्योंकि, इस तरह वित्त की कीमत, श्रम का संबल और बुद्धि विवेक की महत्ता, सबकुछ प्रतिष्ठापित होता है। इससे कर्मठता जगती है और सामाजिक स्तर पर स्थानीय सहयोग व सम्मान मिलता है। पंचायतों के लिए इसीलिए काम से जोड़कर वित्त उपलब्ध कराने का प्रावधान है और साथ ही अपनी बुद्धि, विवेक और श्रम के सहारे धन उगाहने का मौका भी दिया गया है। बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 में पंचायतों को सम्पत्ति अर्जित करने के नियम बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 में पंचायतों को सम्पत्ति अर्जित करने, धारण करने तथा राज्य सरकार की पूर्वं अनुमति से उसका निबटान भी करने की शक्ति प्राप्त है। उन्हें अपने नाम से एक निधि भी गठित करने का अधिकार है जिसमें वर्णित स्रोतों से प्राप्त राशि ही जमा की जा सकेगी। ग्राम पंचायत धारा:26.1 ग्राम पंचायत को सम्पत्ति अर्जित करने, धारण करने और उसके निपटान तथा संविदा करने की शक्ति होगी: परन्तु यह की ग्राम पंचायत द्वारा अचल संपत्ति के निपटान के सभी मामलों में उसे सरकार की पूर्वानुमति प्राप्त करनी होगी। धारा:26.२ केंद्र या रजी सरकार या स्थानीय प्राधिकारी या किसी अन्य ग्राम पंचायत की संपत्ति या उनके द्वारा अनुरक्षित सम्पत्ति को छोड़कर इस धारा में विनिद्रिष्ट ग्राम पंचायत की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर, इस प्रकार की सभी संपत्ति, ग्राम पंचायत में निहित हो जाएगी। धारा:26.5 प्रत्येक ग्राम पंचायत में , ग्राम पंचायत के नाम से एक ग्राम पंचायत निधि गठित की जाएगी और उसमें निम्नांकित जमा किये जायेगें: केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा दिया गया अंशदान और अनुदान, यदि कोई हो। जिला परिषद, पंचायत समिति या किसी अन्य स्थानीय प्राधिकार द्वारा दिया यगा अंशदान और अनुदान, यदि कोई हो। केंद्र और राज्य सरकार मंजूर किया गया ऋण, यदि कोई हो। अपने द्वारा कर, और फीस के मद में वसूली गिया सभी प्राप्तियां। ग्राम पंचायत के नियंत्रण उअर प्रबधन के अधीन रखे गये या इसके द्वारा निर्मित तथा इसमें निहित किसी भी विद्यालय, अस्पताल, औषधालय, भवन, संस्था अथवा निर्माणों से सम्बन्धित सभी प्राप्तियां। ग्राम पंचायत के पक्ष में किसी न्यास अथवा धर्मस्व से होने वाली समस्त आय और दान एवं अशंदान के रूप में प्राप्त की गिया सारी राशियाँ इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन लगाए गये और वसूल किया गये यथा विनिद्रिष्ट जुर्माने एवं शास्तियां, और ग्राम पंचायत द्वारा यह उसकी ओर से प्राप्त की जाने वाली अन्य राशियाँ परिषद के लिए धारा 80 एवं धरा 81 में लगभग इसी तरह के सम्पत्ति अर्जन एंव निधि गठन के प्रावधान दिए गये हैं। धनोपार्जन के लिए ग्राम पंचायतों के लिए धारा 27 में करारोपण तथा धारा 28 में वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया है जो पूर्णतया निर्मित विधि एंव सरकार द्वारा निद्रिष्ट आदेशों के अधीन है। इसी प्रकार पंचायत समिति के लिए धारा 55 एवं धारा 56 पर कराधान तथा ऋण और निपेक्ष निधि का प्रावधान किया गया है। इनमें भी यथाविहित नियमों तथा अर्कार द्वारा विहित आदेशों के आधार पर ही धन उगाही की जा सकेगी। जिला परिषद के लिए भी धारा 82 तथा धारा 83 पर करारोपण तथा वित्तीय व्यवस्थाओं के विषय में चर्चा की गई है। यहाँ भी सरकार द्वारा यथाविहित तथा सरकार की पूर्व मंजूरी की बात कही गई ही। विधिसम्मत वित्त संग्रहण के लिए ततसंबधी अधिसूचना अपेक्षित है। दर, रेट एवं शुल्क निर्धारण से पंचायत राज में विशेषकर ग्राम पंचायतों में वित्त संग्रह के सम्बन्ध में प्रगति संभव हो सकेगी। वित्त के सन्दर्भ में पंचायतों की स्थिति सुधारने के उपाय कुल मिलाकर वित्त के सन्दर्भ में पंचायतों में स्थिति में बदलाव लाने की जरूरत है। यह बदलाव नीचे के उपायों से संभव हो सकता है: दूसरे राज्यों में किए गये उपायों के आधार पर और अधिक उदार होकर अनेक समितियों एंव अध्ययनों में सुझाए गये और तरीकों को आजमा कर । पंचायत राज वित्त निगम को सुदृढ़ कर और इसे उचित वित्तीय आधार एवं शक्ति देकर। कुछ ग्राम पंचायतों में अपनी सोच के आधार पर प्रयोग करके अधिनियम की धारा 28 के तहत । बिहार वित्त आयोग को सक्रिय कर और उसकी अनुशंसा उपलब्ध कर। राज्य की संचित निधि से सहाय अनुदान देकर । भूमि राजस्व संग्रहण का कम से कम 40% अंश देकर । अन्य ग्राम पंचायतों में प्रयुक्त उपाय हमारे गणतंत्र के अन्य राज्यों में, ग्राम पंचायतों को नीचे लिखे ढंग से धन उगाही के अधिकार दिये गये है: आंध्रप्रदेश- ग्राम पंचायत के अपने प्राकृतिक स्रोतों, मेलों एवं त्योहारों से प्राप्त आय । ग्राम पंचायत द्वारा लगाये जानेवाला कर, ड्यटी एवं पुष्क। गृहकर, वाहन कर, कृषि भूमि पर लगने वाला कर, व्यवसाय एवं व्यापार कर, सम्पत्ति के स्थानान्तरण पर कर, सामूहिक भूमि के इस्तेमाल के लिए शुल्क, और ग्राम पंचायत के अधीन इमारतों पर शुल्क। असम- ग्राम पंचायत द्वारा लगाये गये टैक्स, फीस एवं ड्यूटी आदि। गुजरात- कर, शुल्क, वसूलियों चंगुयों आदि की वसूली करके। हिमाचल प्रदेश- ग्राम पंचायत के पास कर और लेवियां लगाने के बध्यताकारी और विवेकाधीन आधिकार हैं। यह आवास कर लगा सकती है और रजी सरकार की पूर्व अनुमति से व्यापार और व्यावसायिक कर तथा सम्पत्ति के हस्तांतरण पर भी लेवी लगा सकती है। इसके अलावा तहजबाजारी और सड़कों की सफाई व प्रकाश व्यवस्था, पशुओं के पंजीकरण आदि फीस, लेवी, कर ले सकती ही। कर्नाटक- कृषि भूमि छोड़कर, भवनों और भूमि पर कर लगाने का अधिकार है। सजीव प्रदर्शन को छोड़ मनोरजन कर, मोटर वाहनों को छोड़कर अन्य वाहन कर, अचल सम्पत्ति के हस्तांतरण पर ड्यूटी, बस-स्टैंडों, बाजारों, चरने वाले जानवरों पर फीस और जल आपूर्ति पर कर आदि। इसके अलावा राज्य सकरार हर ग्राम पंचायत को 1 लाख रूपये प्रतिवर्ष का अनुदान देगी। इस राधी की उपयोग ग्राम पंचायत का द्वारा बिजली के बिलों के भुगतान करने, जल आपूर्ति परियोजनाओं के रखरखाव, स्वच्छता और अन्य कल्याण गतिविधियों के लिए किया जाएगा। किसी भी अन्य राज्य ने ग्राम पंचायतों के लिए इस तरह के प्रावधान नहीं बनाए है.। मध्यप्रदेश- ग्राम पंचायत सम्पत्ति कर यह भूमिकर लगा सकेगी (बशतें कि संपत्ति का मूल्य छः हजार रूपये से अधिक हो, वह राज्य सरकार की सम्पत्ति नहीं हो और धार्मिक या शैक्षिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल न की जाती है) महाराष्ट्र – राज्य सरकार द्वारा ग्राम पंचायत को दिए गए कोष, पंचायत द्वारा लगाए गए कर, जमीन का बेहतरी शुल्क, तीर्थयात्रा कर, मेलों उत्सवों और अन्य मनोरंजनों पर कर, साइकिलों और बैलगाड़ियों पर कर तथा कुछ व्यवसायों, व्यापारों व रोजगार आदि पर कर। पंजाब – भू-राजस्व का चालीस फीसदी हिस्सा राज्य सरकार द्वारा ग्राम पंचायतों को सौपा जाएगा। पंचायत को अपने कायों के निर्वहन के लिए कुछ निश्चित क्षेत्रों में निजी निगम बनाने का अधिकार प्राप्त है। राजस्थान- राज्य में जैम किए गये भू-राजस्व का एक हिस्सा जैसा सरकार द्वारा निर्धारित किया जाए, पंचायत कोष का एक हिस्सा होगा। तमिलनाडू- निवासियों पर गृहकार एंव वाहन कर, लगाएगी । निरीक्षक की अनुमति से भूमिकर भी लगा सकती है। सरकार हर ग्राम पंचायत को एक गाँव गृहकर के बराबर अनुदान देगी जो उसके द्वारा वसूले गए गृहकर की रकम के बराबर होगा। उत्तरप्रदेश- इसको भूमि अधिग्रहण, उधार लेने और कर तथा शुल्क लगाने का भी अधिकार है। पश्चिम बंगाल – राज्य सरकार ने संसाधन लामबंदी को प्रोत्साहन के रूप में एक योजना शुरू की जिसमें ग्राम पंचायतों द्वारा वसूल किये गये कुल करों की रकम के बराबर अनुदान की व्यवस्था की गई है। लेकिन उसकी अधिकतम सीमा 5000 रूपये से अधिक नहीं होगी(1980) राज्य सरकार ने सभी ‘खास’ जमीन तथा तालाब ग्राम पंचायतों ने बंजर जमीन को सामाजिक वन-बागानों में बदल कर अच्छा काम किया जिससे कुछ राजस्व भी प्राप्त हुआ। पंचायतों के विकास के लिए आवश्यक है पैसे का स्त्रोत यह के निर्विवाद तथ्य है न की स्वतंत्र संसाधनों के बिना पंचायतें पर्याप्त कार्यात्मक स्वायत्तता हासिल नहीं कर सकती। और इस ओर सतत प्रयत्नशील रहना राज्य सरकार का कर्तव्य भी है और दायित्व भी। इस सन्दर्भ में सबसे अधिक आवश्यक यह है कि पंचायतों को धन उगाही करने का पूरा मौका मिले, केवल करों या शुल्कों के माध्यम से नहीं, विकासात्मक कार्य के द्वारा भी। इसके कई आयाम हैं जिनपर मोटे तौर पर यही कहा जा सकता है कि वे जरूरी भी हैं और जन हितकारी भी। उनमें से एक है पंचायतों को, विशेषकर ग्राम पंचायतों को एक एक उद्यमी संस्था के रूप में पूर्ण स्वतंत्रता दी जाए। स्थानीय विकास के लिए उप-विधि बनाकर सुनियोजित ढंग से विकास कार्य करने दिया जाए। ऐसा करना एक प्रयोग के तौर पर होना जिसके कुछ सहाय्य स्त्रोत और कुछ नियन्त्रण स्रोतों की व्यवस्था की जानी चाहिए। इस प्रयोग के अतिरिक्त भी कई उपाय हैं पर, वे सभी ‘हिस्सा-बटईया’ वाली स्थिति पैदा करते है जिसमें देनेवाला ‘शिकार’ तथा वसूलने वाला ‘शिकारी’ की तरह नजर आता है। वास्तव में, हर तन्त्र की पहचान धन उगाही के तरीकों से बनती है। यह सोचनीय है कि हमारा गणतंत्र कब तक लगभग राजतन्त्र के इन धनउगाही के साधनों को प्रश्रय देता रहेगा। कायदे से, धनउगाही के सभी स्रोत जमीनी स्तर की लोक संस्थाओं जैसे पंचायतों से जुड़े होने चाहिए। इस तरह की व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ है व्यक्ति के समाज के प्रति दायित्व एंव समाज का व्यक्ति के प्रति झुकाव। पंचायतों को वित्तीय –स्तर पर सशक्त करने के उपाय पंचायतों के वित्तीय –स्तर पर सशक्त करने के कई विधि-सम्मत उपाय हैं वे हैं: पंचायत राज वित्त निगम की पुनः स्थापना की जा सकती है। वर्तमान सभी वित्तीय निगमों से पंचायतों को सीधे जोड़ा जा सकता है। बैंकों की शाखाओं से पंचायतों को जोड़कर विकासोन्मुखी बनाने का प्रयास किया जा सकता है। एन.बी.एफ.सी. जो देहातों में जाकर पूंजी जमा करने का अभियान चलाते रहते हैं उनके दारा उस क्षेत्र से उगाहे धन की ब्याज में पंचायतों को धन दिलाया जा सकता है। पंचायतों को अपने अधीन जमीन-जायदादों के अर्थपूर्ण उपयोग करने की छूट दी जा सकती है। भूमि राजस्व के अंश का निर्धारण किया। एडिटेड बी : स्त्रोत: पंचायती राज विभाग, बिहार सरकार