परिचय आपदा अचानक घटने वाली वह घटना है जिससे सामान्य जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। अचानक लोगों के जान-माल का इतना भारी नुकसान हो जाता है कि जीवन को फिर से पटरी पर लाने के लिए विशेष सामजिक एवं आर्थिक व्यवस्था और सघन प्रयास की आवश्यकता होती है। आपदा दो प्रकार की हो सकती है: प्राकृतिक आपदा एवं मानव जनित आपदा। प्राकृतिक आपदा में बाढ़, भूकम्प, सुखाड़, आंधी-तूफान, चक्रवात, सुनामी, महामारी आदि शामिल हैं। मानवजाति आपदा में आगजनी, बम विस्फोट, यातायात सम्बन्धी बड़ी दुर्घटना, आंतकी हमला, असामाजिक तत्वों द्वारा बड़े पैमाने पर किया गया नरसंहार या अत्याचार आदि घटनाएं आती हैं। पहले ऐसे किसी संकट की घड़ी में कोई व्यक्ति, संस्था या सरकार राहत या बचाव कार्य करके अपनीजिम्मेदारियों से मुक्त हो लेती थी। परन्तु अंतरिक्ष विज्ञान और सूचना तकनीक के वर्तमान दौर में जब हमें कई तरह की आपदाओं की पूर्व सूचना मिल जाती है तो आसन्न आपदा से सम्भावित जान-माल की क्षति बच सकते हैं अथवा उसको कम कर सकते हैं। इसी सोच के आधार पर किए गये प्रयासों को आपदाप्रंबधन कहते हैं। इसमें पंचायतों की अहम भूमिका देखी जा रही है। क्योंकि, शासन और प्रशासन के तंत्र को तो आपदा स्थल पर सहायता पहुंचानी होगी, परन्तु पंचायत तो वहीं मौजूद होती है। अतः उपलब्धता तथा पहुंच की दृष्टि से आपदा प्रंबधन में पंचायत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती ही। आपदा प्रबंधन के तटिन भाग हैं: पूर्व तैयारी, आपदा घटित होने दौरान कार्यवाही तथा आपदा घटित होने के दौरान कार्यवाही तथा आपदा घटित होने के बाद की तैयारी और कार्यवाही। तीन स्थितियों में आपदा प्रंबधन का मूल आधार होता है; सहयोग, सहभागिता एवं संपर्क। इसमें एक भी तत्व की कमी से आपदा प्रबन्धन अधूरा एवं असफल रहता है। आपदा प्रबंधन की पूर्व तैयारी आपदा प्रंबधन में पूर्व तैयारी के समय जनसहयोग की आवश्यकता पड़ती है। आपदा घटित होने जन सहभागिता की आवश्यकता पड़ती है। इन तीनों ही स्थितियों में नीचे लिखी दस बातों पर ध्यान देना जरुरी होता है: आपस में चर्चा जन स्वास्थ्य एवं स्वच्छता रोशनी/बिजली की व्यवस्था यातायात की व्यवस्था भोजन सूचना राहत पहुँचाने से सम्बधित कार्य पीने का पानी ठहरने की जगह बाहर की दुनिया से सम्पर्क साधने के उपाय परन्तु आपदा प्रंबधन की रीढ़ ‘पूर्व तैयारी’ है जिसमें निम्नलिखित शामिल है: आपदा आने के स्रोत का चित्रण अर्थात अगर बाढ़ आने की आशंका है, तो पानी का बहाव किस तरफ से आकार किधर जाएगा। फिर उसी को ध्यान में रखकर आवश्यक प्रंबधन करना। आपदा आने पर कौन-कौन से कम करने होंगे और किस पर किस काम की जिम्मेदारी होगी। समय-समय पर प्रशिक्षण एवं अभ्यास भोजन, जीवनरक्षक दवाइयां तथा अन्य जरूरी चीजें उपयुक्त स्थान पर पर्याप्त मात्र में रखने की व्यवस्था राहत सामग्री को लोगों तक पहुँचाने की व्यवस्था। आपस में तालमेल और संवाद औरतों एवं बच्चों के रहने की व्यवस्था मवेशियों/पालतू पशुओं को रखने का इंतजाम। शौच, सुरक्षा आदि की व्यवस्था। शुद्ध, पीने लायक पानी का प्रबंध पहले भी गाँवों में हम सामजिक सहयोग से इस सामाजिक सहयोग से इस तरह की व्यवस्था करते थे। बरसात के समय सूखी लकड़ी आदि की व्यवस्था, अचार, तैयार नाश्ते का सामान, बेसन, हल्की भोजन सामग्री, दियासलाई, बड़ी, पापड़ आदि की व्यवस्था पहले से ही करके रखते थे जिससे कि बरसात या बाढ़ आने पर कोई परेशानी न हो। यहाँ तक कि ऊँची जगहों पर बने मकान में रहने वाले लोग अपने दालान आदि में नीची जगहों पर रहने वाले लोगों के रहने के लिए व्यवस्था करते थे और स्वविवेक का परिचय देते थे । ठीक उसी तरह, आपदा प्रंबधन में समाज और इस प्रकार समुदाय के लिए बड़े पैमाने पर यथाशीघ्र सारी व्यवस्था करना पंचायत की एक प्रमुख जिम्मेदारी है। हमारे बिहार का पूरा उत्तरी क्षेत्र- गोपालगंज से लेकार किशनगंज तक तथा गंगा के दक्षिणी भूभाग में बक्सर से लेकर बांका तक का क्षेत्र किसी-न-किसी आपदा की सम्भावना से ग्रसित है। बाढ़, सुखाड़, भूकम्प, आगजनी, आतंकवाद आदि दुर्घटनाओं से यहाँ के लोगों को दो-चार होना पड़ता है। नेपाल से सटे बिहार के उत्तरी एवं पूर्वी क्षेत्र को भूकम्प प्रभावित क्षेत्र माना गया है। करीब-करीब पूरा बिहार प्रदेश ही देश के आपदा की गहन सम्भावना वाले क्षेत्रों में से एक है। अतः हमारे लिए स्थानीय विकास के साथ-साथ आपदा प्रंबधन का भी सोच विकसित कर इस दिशा में आय करना आवश्यक है। बिहार पंचायत राज अधिनियम 2006 के अनुसार आपदा प्रबंधन के कार्य बिहार पंचायत राज अधिनियम 2006 में पंचायतों के लिए आपदा प्रंबधन के सन्दर्भ में यूँ तो राहत, बचाव, सहायता आदि की ही चर्चा है परन्तु क्रियान्वयन की दृष्टि से स्थिति इस प्रकार है: i. ग्राम सभा स्तर पर धारा 10 (क) अनुसार “ग्राम पंचायतों के कार्यों एवं स्कीमों और अन्य कार्यकलापों, जो उस ग्राम से सम्बन्धित हो, का पर्यवेक्षण करने और उनसे संबधित रिपोर्ट बैठक में प्रस्तुत करने के लिए ग्राम सभा एक या एक से अधिक निगरानी समितियों को गठित कर सकेगी, जिसमें वैसे व्यक्ति होंगे जो ग्राम पंचायत नहीं तो” इस प्रावधान के तहत ग्राम सभा अगर चाहे तो एक आपदा प्रबन्धन समिति का भी गठन कर सकती है । ii. ग्राम पंचायत स्तर पर अध्याय 3, धारा 22 ‘ ग्राम पंचायत निम्नलिखित विनिर्दिष्ट कार्यों का निष्पादन करेगी। क. सामान्य कार्य 1. पंचायत क्षेत्र के विकास के लिए वार्षिक योजनाओं को तैयार करना। 2. वार्षिक बजट तैयार करना। 3. प्राकृतिक संकट में सहाय्य कार्य करने की शक्ति 4. लोक सम्पत्ति से अतिक्रमण हटाना। 5. स्वैच्छिक श्रमिकों को संगठित करना और सामुदायिक कार्यों में सहयोग करना। 6. गांवों के अनिवार्य सांखियकी आंकड़ों का संधारण” इन सामान्य कार्यों में तीन कार्य ऐसे हैं जिनके अंतर्गत ग्राम पंचायत आपदा प्रबन्धन पर काम कर सकती है। पहला, सामान्य कार्य संख्या (6) के अंतर्गत अपने क्षेत्र में पूर्व में आई आपदाओं एवं उनसे हुए क्षति के विषय में आंकड़े इकट्ठे करके एक नक्शा बनवा सकती है। दूसरा, सामान्य कार्य (5) के अंतर्गत स्वैच्छिक श्रमिकों को संगठित कर उन्हें आपदा के सन्दर्भ में प्रशिक्षित कर सकती है। तथा तीसरा, सामान्य कार्य (3) के अंतर्गत वह सहाय्य कार्य की योजना- निमार्ण कर सकती है। इसके अतिरिक्त अध्याय 3, धारा 33 के अंतर्गत आपदा प्रंबधन के सन्दर्भ में ग्राम पंचायत के लिए विशेष प्रावधान किये गये हैं। धारा 33 ‘ग्राम रक्षा दल का गठन” सामान्य पहरा तथा निगरानी एवं आकस्मिक घटनाओं यथा अगलगी, बाढ़, बांध, में दरार, पुल का टूटना, महामारी का फैलाना तथा चोरी या डकैत आदि का सामना करने, सरकार द्वारा समय-समय पर सौंपे गये कार्यों को समपादित करने तथा सार्वजनिक शांति एवं व्यवस्था बनाये रखने के लिए विहित रीति से नियुक्त एक दलपति के अधीन प्रत्येक ग्राम पंचायत के अंतर्गत एक ग्राम रक्षा दल गठित किया जा सकेगा और ग्राम के 18 से 30 वर्ष एक बीच एक शारीरिक रूप से सभी योग्य व्यक्ति उक्त दल के सदस्य होंगे। ग्राम रक्षा दल के गठन, कर्तव्य एवं उपयोग के लिए सरकार नियम बनायेगी। इस धारा के अंतर्गत ग्राम पंचायत आपदा प्रंबधन एवं संकट समाधान के क्षेत्र में नियोजित ढंग से सबकुछ कर सकता है। इसके लिए इसे एक प्रशिक्षित दल भी उपलब्ध है। इस दल को आपदा प्रंबधन के क्षेत्र में प्रशिक्षण दिलवा देने मात्र से ही बहुत सी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। iii. पंचायत समिति स्तर पर अध्याय 4, धारा 42 “प्रमुख की शक्ति, कार्य और दायित्व घ) पंचायत समिति क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित जन-जीवन को तत्काल राहत देने के प्रयोजानार्थ इसे (प्रमुख को) एक वर्ष में कुल पचीस हजार रूपये तक की राशि स्वीकृत करने की शक्ति होगी” अध्याय 4, धारा 47 ‘पंचायत समिति के कार्य एवं शक्तियां। ” “प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित व्यक्ति को राहत देना’। बिहार पंचायत राज अधिनयम, 2006 में दिए इन प्रावधानों के अतिरिक्त आपदा प्रंबधन के क्षेत्र में पंचायत समिति और पानी विशेष बैठक बुलाकर प्रस्ताव पारित करके जिला परिषद से समाधान के लिए अनुरोध कर सकती है। iv. जिला परिषद स्तर पर ‘अध्याय 5, धारा 69 ड. जिला में प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों को तत्काल राहत देने के लिए उसे एक वर्ष में कुल एक लाख रूपये तक की राशि स्वीकृत करने की शक्ति होगी। परन्तु, जिला परिषद की अगली बैठक में अध्यक्ष ऐसी स्वीकृति का ब्योरा जिला परिषद के समक्ष प्रस्तुत करेगा और उसकी स्वीकृति लेगा। इसके अलावा, धारा 73 के अंतर्गत जिला परिषद के कार्य एवं शक्तियों में यह भी प्रावधान किया गया है कि “धारा 73, 21 (घ) संकटग्रस्तों को राहत देने हेतु उपाय करेगी। इस प्रावधान में दिए ‘उपाय’ के तहत आपदा प्रबंधन के कुछ आयामों पर जिला परिषद पहल कर सकती है। जैसे, सरकार, उसके विभागों एवं अन्य स्रोतों से सम्पर्क करना तथा सहायता प्रस्ताव बनाकर उन्हें प्रस्तुत करना तथा मंजूर कराना आदि। त्रिस्तरीय पंचायत में आपदा प्रंबधन के क्षेत्र में ग्राम पंचायत की सबसे अहम भूमिका है। इसके लिए उसके पास ग्राम रक्षा दल के रूप में एक विशेष माध्यम भी है। चूँकि भारत के 70% आबादी गांवों में रहती है और इसके व्यवस्थापन की जिम्मेदारी पंचातयों के हाथ में सौंप दी गई है, अता इनके प्रतिनिधियों का आपदा प्रंबधन के क्षेत्र में क्षमतावर्द्धन अति आवश्यक हो जाता है। साथ में, यदि ग्राम रक्षा दल को उस क्षेत्र में होने वाली आपदाओं से निबटने के लिए समुचित प्रशिक्षण दिया जाए तो आपदा प्रन्भ्दं के लक्ष्य को प्राप्त करना बहुत हद तक आसान हो जाएगा। उदाहरण के लिए, बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों में ग्राम रक्षा दल को डूबते हए को बचाने, प्राथमिक उपचार, पानी साफ करने की विधि, ओ०आ0 एस०, बिलिचिंग पाउडर, डी0 दी० टी0 आदि के समुचित उपयोग की जानकारी देकर जन-जीवन में होने वाली तबाही को बहुत हदतक कम किया जा सकता है। आपदा प्रंबधन के अंतर्गत प्रमुख रूप से छः कार्य करने होते हैं। वे हैं- - एहतियात - रोकथाम के उपाय - पूर्वं तैयारी - राहत - बचाव, एवं - पुनर्वास इन सभी कार्यों की प्रकृति आपदा विशेष के स्वरुप के अनुरूप होती है, इसके लिए प्रशिक्षण जरुरी है। इन छः कार्यों में पहले तीन तो ग्राम पंचायत को अपने स्तर पर अवश्य करना चाहिए। बाकी तीन के लिए पंचायत समिति एवं जिला परिषद से योगदान अथवा सहयोग लेने का आवश्यकता पड़ सकती है। परन्तु, आपदा प्रंबधन के इन सारे कार्यों में पंचायतों के सहयोग के अलावा जनसहभागिता अत्यंत आवश्यक है। राहत एवं बचाव सामुदायी एहतियात एवं पुनर्स्थापन आपदा प्रबंधन कैसे करें हर स्तर पर आपदा प्रंबधन की सफलता सबसे ज्यादा इस बात पर निर्भर करती है कि जन सहभागिता किस तरह की और किस हद तक प्राप्त हो सकी है। और इस सन्दर्भ में हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि सहयोग ‘स्व’ से शुरू होकर जब ‘अन्य’ तक पहुंचता है तभी साकर होता है। अतः सहायता का क्रम कुछ इस प्रकार होना चाहिए: स्वयं सहायता यह बात सर्वविदित है अकि जब तक स्वयं प्रयास न किया जाए तबतक बाहरी सहायता अधिक फलित नहीं होती। सबसे बड़ी बात है कि इसे प्राप्त करने के लिए किसी को कहीं जाना नहीं पड़ता। यह हर समय, हर जगह हम अपने साथ रखते हैं। स्थानीय सहायता आपदा की स्थिति में बाहरी मददों में स्थानीय सहायता ही सबसे पहले काम आती है। इसलिए स्थानीय व्यवस्था का होना परम आवश्यक है और उसे सुनिश्चित करना आपदा प्रंबधन का एक अहम हिस्सा है। प्रशासनिक सहायता सहायता के इस स्रोत तक खबर पहुंचने से लेकर मदद पहुंचने तक काफी समय लग जाता है। क्योंकि, इनके काम करने का अपना तरीका होता है जिससे हटकर सामन्यतः यहाँ कोई कुछ नहीं करना चाहता । इसी कारण अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी प्रशासनिक मदद पहुंचने में लगभग 72 घंटों तक समय लग जाता है। इसके अलावा, प्रशासन के सहायता पहुँचाने के पाने मापदंड हैं उसे इन्हें ही पूरा करने की चिंता होती है। उससे आगे किस स्तर से कौन आदेश दे रहा है इस पर विचार करना होगा। सरकारी सहायता यह सबसे बाद में मिलने वाली सहायता है। यह पुनर्वास की स्थिति से ज्यादा जुडी है। यह सरकार से सरकार के बीच की बात है। इसका आधार आपदा नहीं आपदा के आकलन रिपोर्ट को किस हद तक स्वीकृत किया जाता है, उस पर निर्भर करता है। आपदा प्रबन्धन एवं संकट समाधान के लिए पंचायतों को, विशेषकर ग्राम पंचायत को, अपनी योजना बनाकर स्वयं-सहायता एवं स्थानीय सहायता तथा ग्राम रक्षा बल के आधार पर जरुरी कदम उठाने चाहिएं। प्रशिक्षण और ‘हरदम तैयार’ वाली स्थिति पर अधिक ध्यान देना चहिए। । क्योंकि आपदा के समय जन अपेक्षाओं का सामना सबसे पहले पंचायतों, विशेषकर ग्राम पंचायत, को ही करना होता है। उन्हें संकट से जूझती जनता की अपेक्षाओं पर भी खरा उतरना है। आपदाओं की सूची (बिहार के सन्दर्भ में ) जल एंव मौसम संबंधी आपदा बाढ़ लू तथा शीतलहरी सुखाड़ ठनका (बिजली गिरना) भूगर्भीय आपदा भूकम्प बाँध टूटना दुर्घटना संबंधी आपदा पर्व-त्यौहार सम्बन्धी बिजली से आगलगी गाँव में फैली आग नाव डूबना रेल, रोड, हवाई जहाज की स्त्रोत: पंचायती राज विभाग, बिहार सरकार