परिचय इस भाग में प्रशिक्षकों के लिए कुछ ऐसे विषय रखे गये हैं जिसपर उनकी खुद की समझ विकसित हो सकेगी इसे समूह और सामाजिक परिवर्तन में छोटे समूह का महत्व, समूह क्या हैं? सामाजिक बदलाव की तैयारी का माध्यम, छोटे समूह के संदर्भ में महत्वपूर्ण बिन्दु, समूह की प्रक्रियाएं, संचार, प्रभावी संचार में श्रवण/ग्रहण करने का महत्व, संचार के प्रकार, सहभागिता, समूह में सहभागिता बढ़ाने के महत्वपूर्ण घटक, नेतृत्व के प्रमुख आयाम, नेतृत्व के प्रकार, नेतृत्व में लचीलापन, छोटे समूह में नेतृत्व निर्धारण, निर्णय प्रक्रिया और मतभेद निपटारा, निर्णय का क्रियान्वयन। समूह और सामाजिक परिवर्तन में छोटे समूह का महत्व समूह क्या है? व्यक्ति जन्म से ही संबंध विकसित करने की प्रक्रिया में जुड़ जाता है। इस परस्पर संबंध के अनेक रूप हो सकते हैं। संबंध परिवार में हो सकता है, पड़ोसियों में हो सकता है, एक साथ काम करने वाले लोगों में हो सकता है और इस संबंध का आधार होता है आपसी जुड़ाव। जब जुड़ाव को समूह कहा जाता है। समूह के लोगों का आपस में संचार अथवा जुड़ाव होना आवश्यक है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर साथ होने का आभास हो। अपने आपको समूह का हिस्सा देखते हैं। कुछ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उद्देश्य हों। एक इकाई के रूप में काम करने की क्षमता हो। एक परिवार, दोस्तों का समूह, एक संस्था, ट्रेड युनियन इत्यादि सभी एक प्रकार के समूह हैं। छोटे समूह में सदस्यों की संख्या 5 से 15 हो सकती है लेकिन कई बार समूह बड़ा भी हो सकता है जैसे एक पूरे स्कूल का समूह या जाति समूह। वह समूह जिसमें व्यक्ति जन्म से ही एक सदस्य के रूप में देखा जाता है वह प्राथमिक समूह कहलाता है जैसे कि परिवार, किन्तु जुड़ाव के आधार पर समय-समय पर जो संबंध स्थापित होते है वह द्वितीय एवं तृतीय समूह कहलाता हैं। समूह किसी छोटी समय सीमा के लिए बनाए जा सकते हैं जैसे कि प्रशिक्षण में प्रशिक्षार्थियों का समूह व एक लंबे समय के लिए भी काम कर सकते है जैसे संस्था का समूह। सामाजिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में समूह का महत्व प्रशिक्षण के संदर्भ में समूह सीख बनाने का एक बहुत सशक्त माध्यम है। इसमें सभी तरह के लोग जैसे कि जो प्रभावशाली व्यक्तित्व के होते है, जो संकोची प्रवृत्ति के होते हैं, जो अच्छे नेतृत्व के गुण रखते हैं, जिनका अच्छा अनुभव होता है, शामिल होते हैं। सभी को विचार व्यक्त करने का मौका आसानी से मिल सकता है। छोटा समूह बड़े समाज का प्रतिविंब होता है व बड़े समाज में चलने वाली सभी प्रक्रियाएं छोटे समूहों में भी पायी जाती हैं। छोटे होने के कारण इसमें प्रक्रियाओं को समझने, नियंत्रण करने व अपने कशौल को व्यक्त करने का मौका आसानी से मिल जाता है। यहाँ संभव हो पाता है कि लोग आपस में अनुभवों को बाँट सके और सीख बना सके। सामाजिक बदलाव का माध्यम छोटे समूह में चलने वाली प्रक्रियाओं से आए बदलाव को बड़े समाज में व्यक्त करना आसान हो जाता है। अत: छोटा समूह सामाजिक बदलाव और सामाजिक निर्माण का एक सशक्त माध्यम है। छोटे समूह में लाये गये परिवर्तन जब बड़े समाज में पुन: निर्मित किए जाते हैं, तो सामाजिक बदलाव आसान हो जाता है। समूह एक माध्यम हो जाता है जहाँ पर समूह के सदस्यों को अनुभव के आधार पर, अपने स्वयं एवं व्यक्तित्व को विकसित करने का का अवसर मिलता है। छोटे समूह के महत्वपूर्ण बिन्दु परस्पर न्याय समूह में काम करने वाले व्यक्ति अपने समय, अपनी योग्यता और उसके आधार पर मिली रिवार्ड्स की तुलना दुसरे व्यक्ति की समय योग्यता और उसको मिले हुए रिवार्ड्स (पुरस्कार) से करते रहते हैं। इस तुलना में न्याय दिखना बहुत आवश्यक है अन्यथा यह समूह को कमजोर कर सकता है। मेरी योग्यता और समय समूह में मुझे मिले इनाम -------------------------------- ------------------------------------- दूसरे की योग्यता और समय दूसरे के इनाम व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर समूह के उद्देश्यों को पूरा करने की समझ विकसित होना समूह के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। खास तौर से सामाजिक बदलाव के संदर्भ में। इस प्रक्रिया में समूह के नेतृत्व की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सामाजिक बदलाव एक लंबी प्रक्रिया है और समाज के सभी हिस्सों के लिए लाभकारी होती है, खासतौर से पिछड़े और शोषित वर्ग के लिए, जैसे के दलित, गरीब व महिलाएँ। समूह को इस सामाजिक बदलाव के लिए तैयार करना समूह सदस्यों के मानसिकता व दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना और उनकी नयी सीख बनाना छोटे समूह का मुख्य काम है। आपसी जुड़ाव समूह के सदस्यों का मनोवैज्ञानिक स्तर पर जुड़ाव, समूह की प्रक्रियाओं को सहज बनाता हैं और समूह को मजबूत करता हैं। इस जुड़ाव में कमी आने से समूह में प्रक्रियाएं बाधित होती है। समूह में उसकी इकाई अर्थात प्रत्येक व्यक्ति के उद्देश्य, समूह के उद्देश्य, इन दोनों का आपसी सामंजस्य सीख बनाने के लिए बहुत आवश्यक है। व्यक्ति की निजी जरूरत और समूह के उद्देश्यों में विरोधाभास होने पर समूह में कठिनाई होती है। समूह के उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ छोटे समूह में चलने वाली मुख्य प्रक्रियायें प्रक्रियाओं का अर्थ है समूह किस प्रकार से अपने कार्य को गति देता है। समूह उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आपस में किस प्रकार का सहयोग देता है, संचार के कैसे तरीके अपनाता है, नेतृत्व की क्या आवश्यकता व क्या भूमिका है, समूह के सदस्य आपसी मतभेद को किस प्रकार निपटाते हैं इत्यादि इन प्रक्रियाओं अच्छी समझ विकसित होने से एक प्रशिक्षक समूह को सामाजिक बदलाव के लिए भली भांति प्रयोग कर सकता है। मोटे तौर पर समूह में निम्नलिखित प्रक्रियाएं उल्लेखनीय है जिनके बारे में विस्तार से अगले भाग में दिया गया – संचार सहभागिता नेतृत्व मतभेद निपटारा और निर्णय प्रक्रिया समस्याओं का निवारण समूह निर्माण के चरण प्रत्येक समूह अपने विकास के क्रम में कुछ निश्चित चरणों से गुजरता है। मोटे – मोटे तौर पर ये चरण सभी समूह के लिए समान्य हैं। यद्यपि इनका प्रारूप अलग - अलग हो सकता है। पहला चरण – समूह के जीवन का पहला चरण समूह बनने से संबंध रखता है। इस चरण में सदस्य सुरक्षा की भावना महसूस करना चाहते हैं, अपनी बातचीत और व्यवहार में कुछ दूरी रखते हैं और एक दुसरे के साथ सतही तौर पर संबंध स्थापित करते हैं। सत्ता चाहे वह प्रशिक्षक की हो, के प्रति निर्भरता दर्शाते हैं। भौतिक व अन्य छोटे – मोटे आयामों जैसे- रोशनी, रहने-खाने की व्यवस्था, बैठने का स्थान इत्यादि को लेकर शिकायतें करते हैं और सत्ता के सामने स्वीकृति पाने के लिए तरह – तरह के हथखंडे अपनाते हैं। शुरू के इस चरण में समूह के सदस्य या तो व्यस्तता दर्शाते हैं या दूरी। दूसरा चरण – समूह में दूसरा चरण दूगड्डे और तिगड्डे के रूप में उभरता है। सदस्य अपने जैसे ही दूसरे सदस्यों को ढूँढ निकालता है और उनके साथ घनिष्ठ संबंध बनाने का प्रयास करता हैं। अपने ही दूगड्डे या तिगड्डे में राहत और सहयोग महसूस करते हैं। इसके आधार पर थोड़ा – बहुत सत्ता को चुनौती भी देते हैं। समूह के कार्य पर ध्यान देना लगभग शुरू ही होता है और ज्यादातर समय और शक्ति अपने छोटे तिगड़े – दूगड्डे में राहत और सहयोग महसूस करते हैं। इसके आधार पर थोड़ा- बहुत सत्ता को चुनौती भी देते हैं। समूह के कार्य पर ध्यान देना लगभग शुरू ही होता है और ज्यादातर समय और शक्ति अपने छोटे तिगड़े – दूगाड्डे में ही बनी रहती है। जोड़ा बनना इस चरण एक दर्शनीय उदाहरण है। तीसरा चरण : समूह में तीसरा चरण समूह के कार्य के प्रति गंभीरता लिए होता है। दूगड्डे और तिगड्डे धीरे-धीरे खुलने लगते हैं और समूह के अन्य सदस्यों के साथ जुड़ने का प्रयास करते हैं। सदस्य अपने समूह के काम के लिए अधिक जिम्मेदारी देना शुरू करते हैं और सत्तधारी व्यक्ति के प्रति सहज संबंध होना शुरू हो जाते हैं। समूह में भिन्न-भिन्न लोगों के साथ व्यवहार और संबंध होना शुरू हो जाते हैं। समूह में भिन्न – भिन्न लोगों के साथ व्यवहार और संबंध स्वीकृत और स्थापित होना शुरू हो जाते हैं। चौथा चरण – यह चरण पूर्ण रूप से समक्ष तरीके से कार्य कर रहे समूह के चरण को दर्शाता है। जिसमें सभी सदस्य समूह के कार्य में पूरी तरह से जुड़े रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति समूह के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए अपना पूरा योगदान देता है। समूह के नियम और तौर – तरीकों का पालन होता है और समूह के सक्षम कार्यकलाप को बनाये रखने के लिए सामूहिक रूप से सदस्यों पर दबाव पड़ता रहता है। समूह अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सक्रिय रहता है और बाहरी वातावरण से नयी जानकारी प्राप्त होने पर उन उद्देश्यों को पुन: परिभाषित करता है। एक स्वायत्ता के रूप में समूह अपने उद्देश्यों की ओर आगे बढ़ता है। लंबे अरसे तक चलने वाले समूह की स्थापना इस चरण में हो जाती है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि समूह के विकास में ऊपर बताए गए चरण क्रमबद्धता से उभरते हैं। यह भी संभव है कि कोई समूह तीसरे चरण में पहुँचने के बाद पुन: दुसरे चरण में फिसल कर आ सकता है। इस तरह की फिसलन सामान्य होती है और सक्षम समूह विकास वह है जो कि पुन: समूह को चौथे चरण से ले जाएँ और उसी पर बनाए रख सकें। टीम में काम करने के आवश्यक पहलू हम सभी समूहों, समितियों, संगठनों तथा समुदायों में कार्य करते हैं। सामूहिक रूप से कार्य करने के लिए कुछ मौलिक तत्वों की पकड़ होना आवश्यक है। निम्नलिखित कुछ ऐसे ही तत्वों पर तत्काल कुशलता हासिल करना शायद संभव न हो, किन्तु वे सामूहिक रूप से कार्य करने में दिशा निर्देश के रूप में सैदव काम आते हैं: टीम में कार्य करने के लिए समूह के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की समझ व उनके प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक है। टीम में कार्य करने के लिए समूह में उपलब्ध विभिन्न व्यक्तिगत क्षमताओं का भरपूर उपयोग किया जाना आवश्यक है। टीम के कार्य करने की सफलता दूसरों की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशीलता, रचनात्मक एवं खुलेपन को प्रोत्साहन देने पर निर्भर करती है। टीम ने प्रभावी रूप से कार्य करने के लिए नेतृत्व में साझेदारी अत्यंत अनिवार्य है। टीम में कार्य करने हेतु विशेष परिस्थितियों एवं समस्याओं से निपटने एवं निर्णय लेने के लिए उचित पद्धतियाँ तैयार करना आवश्यक है। टीम में कार्य करने के लिए समूह प्रक्रिया के परिक्षण में स्वयं समूह की योग्यता एक आवश्यक पक्ष है। टीम में कार्य करने के लिए सम्प्रेषण एवं संबंधों में आपसी विश्वास एवं खुलेपन का होना आवश्यक है। टीम में कार्य तभी पूरा हो सकता है, जब समूह के सदस्यों में समूह से संबंध होने की भावना हो। समूह के प्रतिरोधी/ रूकावट डालने वाले तत्व कुछ व्यवाहरिक तत्व, जो कि समूह के कार्यों में बाधा डालते हैं। यह प्रमुख रूप से निम्न है- सूचनाओं एवं विस्तृत जानकारियों को छुपाना तक रोकना- कोई सदस्य किन्हीं सदस्य किन्हीं विषयों पर विस्तृत जानकारी रखता है लेकिन वह जान बूझकर ओर लोगों से नहीं बांटता। सूचनाओं को जान बूझकर गलत प्रकट करना – व्यक्तिगत लाभ के लिए जानकारी का अनुचित प्रयोग करना। दूगड्डे बनाना – समस्या का समाधान ढूँढने के बजाए दूगड्डे बनाकर समस्या को और उलझाना। आपसी झगड़ा – समूह में जीत- हार जैसी परिस्थिति बनाकर समूह प्रक्रियाओं में बाधा डालना। संचार संचार वह सभी तरीके हैं जिससे समूह एक दुसरे के साथ भाव, जानकारी, इत्यादि व्यक्त करते हैं। इसमें शाब्दिक व गैर शाब्दिक एक पक्षीय, अथवा द्विपक्षीय हो सकता है। यह उच्च स्तर से नीचे की ओर जाता हुआ बहाव हो सकता है व निचले स्तर से ऊपर की तरफ जाता हुआ भी हो सकता है। जैसे कि अधिकतर संस्थाओं में या औपचारिक ढांचों जैसे सरकारी दफ्तर इत्यादि में पाया जाता है। कई बार संचार बहूउद्देशीय होता है व कई दिशाओं में एक साथ चलता रहता है। संचार में शाब्दिक के अतिरिक्त गैर शाब्दिक संचार का जैसे हमारे चेहरे के भाव, हाथों का इस्तेमाल, कपड़े, इत्र इत्यादि सभी चीजें जुड़ जाती है। संचार का एक पूरा चक्र होता है – शाब्दिक/ गैर शाब्दिक वक्ता/श्रोत प्रतिक्रिया माध्यम श्रोता/ग्रहणकर्ता संचार चक्र के महत्वपूर्ण बिन्दु हैं :- वक्ता या संचार का स्रोत संचार का माध्यम जैसे अखबार, रेडियो, टेलीविजन इत्यादि स्रोता या संचार का ग्रहणकर्ता प्रतिक्रिया/जब ग्रहणकर्ता वक्ता के शाब्दिक एवं गैर शाब्दिक संचार के आधार पर ग्रहण किए विचार पर प्रतिक्रिया व्यक्त करता है तभी संचार का चक्र पूरा होता है। गैर शाब्दिक संचार के महत्व शारीरिक हाव - भाव जैसे इशारा, चेहरे ए भाव, आँखों के इस्तेमाल, इत्यादि संचार पर गहरा प्रभाव डालते हैं। स्पर्श करके जैसे शबाशी देने में, प्यार से थपथापना, कान खींचना इत्यादि तरीकों से बहुत सी ऐसी भावनाएं व्यक्त की जा सकती हैं जो कि शब्दों के साथ व्यक्त करना कठिन है। स्वर तथा आवाज के उतार - चढ़ाव जैसे गुस्से में बोलना, हंसकर बोलना, फुस – फूसाना इत्यादि भावनाओं को मजबूती से दर्शाते हैं। कपड़ा, जेवर, सौंदर्य प्रसाधनों के प्रयोग से भी हम अपने व्यक्तित्व के बारे में शब्दों से न कहे जाने वाले वक्तव्यों को प्रकट करते हैं। चोप रहकर व कुछ प्रतिक्रिया न देकर भी हम बहुत प्रभावशाली संचार करते हैं इससे हम अपनी असहमति, क्रोध इत्यादि व्यक्त कर सकते हैं। प्रभावी संचार में श्रवण/ग्रहण करने का महत्व किसी भी तरह के संचार में विचारों को ग्रहण करना, जाहिर करना उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना खासतौर से शाब्दिक संचार में सुनने का या श्रवण क्र ने का महत्व है। ध्यान से सुनने से हमें दूसरों के विचार दृष्टिकोण और सोच का ज्ञान होता है। ध्यान से सुनने से ही हम सही ज्ञान का सृजन कर सकते हैं। यहाँ पर सुनने से अर्थ है कि सुनना और समझना दोनों ही। संचार कई कारणों से प्रभावित होता है जैसे कि : हमारे दृष्टिकोण भौतिक वातावरण शब्दों के चुनाव संचार को प्रभावी बनाने में भौतिक वातावरण महत्वपूर्ण है लेकिन इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है हमारे दृष्टिकोण। हम शब्दों को और उसके साथ चल रहे गैर शाब्दिक संचार को अपने दृष्टिकोण, मूल्यों, समझ, अनुभव, पृष्ठभूमि के आधार पर समझते हैं। संभवत: कई बार यह स्रोत/कहने वाले की समझ से भिन्न होता है अर्थात हमारा दृष्टिकोण को समझकर ही प्रभावी संचार स्थापित किया जा सकता है। प्रभावी संचार में शब्दों का उपयुक्त चुनाव भी महत्वपूर्ण है। अत: प्रभावी संचार के लिए विस्तृत शब्दावली का ज्ञान भी जरूरी है। संचार के प्रकार संचार एक पक्षीय, द्विपक्षीय व विस्तृत भी हो सकता है। प्रशिक्षण में प्रभावी संचार के लिए प्रयत्न करना चाहिए कि यह एक पक्षीय न रहे और प्रतिभागी भी इस प्रक्रिया में व्यापक सहभागिता निभाए। सामाजिक बदलाव के लिए कार्यरत, विकास कार्यकर्ताओं की संचार में दक्षता महूत महत्वपूर्ण है। उन्हें संचार को व्यापक, द्विपक्षीय, सृजनात्मक और प्रभावी बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। अन्यथा हमारे कार्यक्रमों से सामाजिक परिवर्तन का कम कठिन हो जाएगा। संचार कई प्रकार का होता है: 1. एक मार्गी और द्वि मार्गी अ. एक मार्गी : इस प्रकार के संचार पर आपका ध्यान अवश्य गया होगा। जब आप भाषण सुन रहे होते हैं तब केवल वक्ता बोलता है व शेष सभी सुनते हैं। कभी कभी क्षेत्रीय कार्यकर्त्ता गरीब महिलाओं से बातें करते हैं और वे सुनती हैं। बी. द्वि मार्गी : द्वि - मार्गी संचार वह है जिसमें महतो और विंदा दोनों आपस में बातें कर रही हों। इस प्रकार का संचार मार्गी से बेहतर होता है क्योंकी – इससे दोनों व्यक्तियों को परस्पर कहने – सुनने का अवसर मिलता है। इससे यह सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है कि नीना और चन्द्र दोनों एक दुसरे की समझ रही है क्योंकी दोनों ही एक दुसरे की बात को स्पष्ट रूप से समझने के लिए प्रश्न पूछ सकती है। इससे महतो और विंदा के बीच समानता की स्थिति पैदा होती है। दोनों में कोई भी ऊबता नहीं है, जैसा कि अपने लंबे भाषण के दौरान अक्सर पाया होगा। पर द्वि – मार्गी संचार में एक – मार्गी संचार की अपेक्षा अधिक समय लगता है। इसके लिए अधिक प्रयास भी करना पड़ता है। सहभागिता समूह के अंदर चलने वाली प्रक्रियाओं में से एक प्रक्रिया सहभागिता भी है। जिसें समूह की एक आधारभूत प्रक्रिया भी कहा जा सकता है। सहभागिता का अर्थ है किसी भी कार्य में भाग या कुछ बाँटना। सहभागिता का अर्थ एक जुड़ावकी प्रक्रिया हैं। सहभागिता को हम इस तरह से भी समझ सकते हैं। ग्रामीणों द्वारा उपलब्ध आर्थिक एवं सामाजिक संसाधनों का सदुपयोग ही सहभागिता है। सहभागिता तभी प्रभावी होती है, जब लोगों द्वारा उनके सेवा निष्पादन में सुधार हो। सहभागिता एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें ग्रामीणों के बीच एकता और आत्मविश्वास बनी रहती है। बुनियादी ज्ञान में वृद्धि, अभिवृत्ति एवं कार्य दक्षता उत्पन्न करना ताकि विकास कार्य में प्रभावी भूमिका निभा सकें। सहभागिता परिवर्तन का काम एक व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता। इसके लिए लोगों की सहभागिता आवश्यक है अत: लोगों को अपने बारे में जानना चाहिए, अपनी क्षमताओं को पहचानना चाहिए। उन्हें महसूस करना चाहिए कि उनका जीवन आस-पास की घटनाओं से प्रभावित होता है। हमें चाहिए कि हम उनको एक दुसरे से निकट लाने एवं मौजूदा स्थिति को समझने में उनकी मदद करें। और उसके लिए सहभागिता एक ऐसा माध्यम है। सहभागिता बहुत सारे में तत्वों पर निर्भर करती है :- समूह में जो वातावरण बना है, सदस्यों में आपसी ताल – मेल कैसा है, सदस्यों की समूह में दिलचस्पी कैसी है, किसी उद्देश्य से सदस्य समूह से जुड़ते हैं समूह में किस प्रकार का संचार हो रहा है, ऊपर दिए निम्नलिखित बातों के तालमेल में अभाव के कारण समूह में सहभागिता की कमी होगी। यह किसी भी समूह के विक्स को प्रभावित कर सकती है। इसका नतीजा यह होगा कि समूह में एक – या दो सदस्य ही सक्रिय भूमिका निभायेगें, बाकी सभी सदस्य निष्क्रिय भूमिका निभाएगें। सहभागिता एक बहुत ही महत्वपूर्ण भाग है सभी सदस्यों द्वारा एक दुसरे के भावनाओं, विचारों एंव भूमिकाओं को सम्मान देना आवश्यक है तभी समूह का सतत विकास संभव है। सहभागिता क्यों ? सहभागिता किसी भी विकास कार्य को सतत गति प्रदान करती है। सहभागिता के कारण समूह में एकता बनी रहती है तथा समूह के टूटने की संभावनायें आंशिक होती है। यदि हम ग्रामीण परिवेश में देखें तो पाएँगे कि गाँव में लोगों के बीच सहयोग की भावना की कमी होती है। इस वातावरण में समुदाय के लोगों के स्वयं सहायता समूह गाँव में सामाजिक सकते हैं। सहभगिता में सक्रियता आवश्यक है। इससे को भी कार्य या परियोजना अपने उद्देश्यों को प्राप्त करता है। समूह में अच्छा वातावरण सहभागिता की प्रक्रिया को बढ़ाने में सहयोग करते ही समूह में अच्छे वातावरण के निर्माण में समूह के नेता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। अंततः सहभागिता लोगों के लिए, लोगों से और लोगों के द्वरा ही क्रियान्वयन करने वाली एक प्रक्रिया है इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया से निम्नलिखित फायदे हैं:- सहभागिता लोगों की जरूरतों को पूरा करती है, सहभगिता स्वालंबन प्रदान करती है, सहभागिता सामुदायिक जीवन को बढ़ावा देती है। रूढ़िवादी से प्रगतिशीलता की ओर जाने की दिशा में। सहभागिता जागरूकता को बढ़ाती है, सहभगिता सभी को भावनाओं, विचारों आदि को सम्मान प्रदान करती है, सहभागिता द्वारा ही सतत विकास संभव है। सहभागिता वह मूलभूत प्रक्रिया है जो सदस्यों का समूह के के उद्देश्यों प्रति चिंता, सजगता, तत्परता और समर्पण दर्शाता है। सहभागिता समूह का एक आधार प्रक्रिया है। प्रत्येक सदस्य की विभिन्न प्रक्रियाओं में सहभगिता कम ज्यादा हो सकती है। अर्थात सहभगिता का स्तर, सदस्यों, उद्देश्यों, व्यक्तिगत जरूरतों, समूह से जुड़ाव इत्यादि पर निर्भर करता है। अलग अलग समय पर सहभागिता का स्तर अलग अलग सदस्यों के लिए अलग अलग होता है। सामाजिक बदलाव के लिए किए गए प्रशिक्षण की सफलता, सदस्यों की सहभागिता पर निर्भर करती है। प्रशिक्षक को निरंतर उन सदस्यों को जो कि निष्क्रिय हैं और समूह प्रक्रियाओं से कट गए हैं, समूह में जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए। सहभागिता को मजबूत करने के तीन महत्वपूर्ण घटक हैं। सदस्य नेतृत्व सहभागी प्रक्रियाएं यह तीनों घटक जब एक अच्छा सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं तों समूह के उद्देश्य सुदृढ़ होते हैं। इन तीनों घटकों की सहभागिता विकास के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। समूह में सहभगिता बढ़ाने के लिए तीन महत्वपूर्ण घटकों की निम्न भूमिकाएँ हैं। समूह सदस्य समूह के कार्यों के प्रति निष्ठा रखना। आपसी सहयोग बनाए रखना। व्यक्तिगत लाभ से हटकर सोचना। नेतृत्व समूह के लक्ष्य निर्धारण में समूह में अनुशासन एवं नियम बनाने के लिए समूह की प्रक्रियाओं का संचालन और नियंत्रण करना समूह में भूमिकाओं को बाँटना और लक्ष्य प्राप्ति से मिले हुए प्रोत्साहन का उत्तरदायित्व देना सहभागी प्रक्रियाएं उचित वातावरण सहज और सुरक्षित उचित भाषा का चुनाव समूह के उद्देश्यों की स्पष्टता और जुड़ाव समूह में न्याय की परिस्थिति प्रशिक्षण का उद्देश्य समाजिक बदलाव होता है। प्राय: प्रशिक्षक समुदाय के साथ काम करते हैं। प्रशिक्षण के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए सहभागिता को दो प्रमुख रूपों से देखा जा सकता है, एक प्रशिक्षण के दौरान समूह में सहभागिता और दूसरा प्रशिक्षण के उपरांत समुदाय की कार्यक्रमों/समुदाय विकास में बढ़ती सहभागिता। नेतृत्व सामाजिक बदलाव के लिए प्रशिक्षण में नेतृव की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। नेतृत्व वह कारक है जिससे समूह की सभी प्रक्रियाएं प्रभावित होती है। नेतृत्व को समझने के लिए यह समझना जरूरी है कि सिर्फ बोलते रहना और समूह की प्रक्रियाओं पर हावी रहना ही नेतृत्व नहीं है बल्कि समूह की प्रक्रियाओं को नियंत्रित कर समूह के उद्देश्यों को आगे बढ़ाना, समूह में बराबर को जुड़ावबनाये रखना और सहभगिता को बढ़ावा देना नेतृत्व के बहुत महत्वपूर्ण गुण हैं। सामजिक परिवर्तन के संदर्भ में पारंपरिक नेतृत्व के बदलाव की आवश्यकता भी है। सामाजिक ढांचे में नेतृत्व अधिकतर सबल व्यक्ति के हाथ में था। यह व्यक्ति सामाजिक प्रक्रिया को अपनी निजी लाभ के लिए प्रभावित करता रहता है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि या तो पारंपरिक नेतृत्व का दृष्टिकोण बदले या नेतृत्व ही बदले या नेतृत्व ही बदले। अत: ऐसे में प्रशिक्षक की एक अहम भूमिका होती है समूह प्रक्रियाओं के माध्यम से पिछड़े वर्गों ने नेतृत्व का विकास करने की। नेतृत्व – सामाजिक ढांचे में पारंपरिक नेतृत्व कुछ सबल लोगों के हाथ में नेतृत्व का विकास और प्रसार – प्रशिक्षण के माध्यम से नेतृत्व का विकास और नेतृत्व में अधिक लोगों की जिम्मेदारी । नेतृत्व के प्रमुख आयाम समूह के उद्देश्य निर्धारित करना समूह का गठन और प्रक्रियाओं बढ़ाना समूह सदस्यों का विकास समूह निरंतर आगे बढ़ते रहना व अपने उद्देश्यों को प्राप्त करना अचानक ही नहीं होता, बल्कि एक अच्छे नेतृत्व का प्रभाव होता है। एक अच्छा नेतृत्व समूह के सभी सदस्यों को, उद्देश्यों के प्रति जागरूक और प्रेरित करता है। नेतृत्व ऊपर दिए हुए तीनों बिन्दुओं के लिए जबावदेह होता है। नेतृत्व के प्रकार तानाशाही : अपनी मनमानी करने वाला अपने निर्देशों को मान्यता देने वाला प्रजातांत्रिक : लोगों की राय लेने वाला आम सहमित बनाकर काम करने वाला समूह में सह्भागिता को बढ़ावा देने वाला उदासीन नेतृत्व : समूह उद्देश्य की चिंता नहीं लोगों व कार्यों में रुचि नहीं नेतृत्व में लचीलापन एक अच्छे नेतृत्व के लिए आवश्यक है कि वह कार्य की जटिलता, सदस्यों की क्षमता और कटिबद्धता को देखते को मोड़ सके अर्थात कार्यशैली में लचीलापन सके। कार्य : सरल जटिल क्षमता : कम – सहयोगी को प्रोत्साहन दें (प्रोत्साहन) सहयोगी को निर्देश दें (निर्देशात्मक) अधिक – सदस्य के साथ कार्यभार को बांटे (कार्यभार का बंटवारा) कार्य को सौंपा करें (सौंपना) इन स्वरूपों के आधार पर अलग – अलग परिस्थितियों और व्यक्तियों के साथ नेतृत्व का व्यवहार अलग- अलग होना चाहिए। यह स्वरूप करेंगे कार्य की जटिलता, परिस्थिति की विशिष्टता, कार्य संपादन करने वाले व्यक्ति की योग्यता व समूह उद्देश्यों के प्रति उसकी लगन पर। इन सभी परिस्थितियों को ध्यान रखते हुए एक अच्छा नेतृत्व अपनी शैली का चुनाव करता है। छोटे समूह में नेतृत्व निर्धारण समूहों में नेतृत्व का उभरना एक बहुत रोचक प्रक्रिया है। अक्सर नेतृत्व के लिए संघर्ष हटा है और फिर कई कारणों के आधार पर जैसे ज्ञान, प्रतिष्ठा, उम्र, दक्षता, अनुभव इत्यादि, नेतृत्व कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के पास आने लगता है। कई जगह यह नेतृत्व ऊपर से थोप भी दिया जाता है। ऐसे में नेतृत्व का संघर्ष निरंतर चलता ही रहता है। यह मानना ठीक नहीं होगा कि नेतृत्व स्थायी तौर पर किसी एक व्यक्ति के हाथ में हमेशा रहेगा। परिस्थितियों के अनुसार नेतृत्व भी बदलता रहता है। निर्णय प्रक्रिया और मतभेद निपटारा समूह में निर्णय के संबंध में निम्न बिन्दु महत्वपूर्ण हैं :- निर्णय की प्रक्रिया मतभेद निपटारा निर्णय प्रक्रिया निर्णय प्रक्रिया अर्थात समूह निर्णय कैसे लेता है। जैसे कि मतदान से, आम राय बनाकर, चुपचाप समझकर, सदस्यों के बीच में अच्छा सामंजस्य बनाकर आदि। यह निर्णय की परिस्थिति व नेतृत्व की शैली पर निर्भर करता है। निर्णय कई प्रकार के हो सकता हैं जैसे की, स्व-निर्धारित - किसी एक व्यक्ति द्वारा निर्णय लिया जाना। वह व्यक्ति जो समूह में प्रभुत्व रखता है निर्णय ले लेता है बाकी सदस्य उस निर्णय को मान लेते हैं। जुड़वा – एक व्यक्ति सुझाव देता है तो दूसरा हाँ में हाँ भर देता है। यह दो व्यक्ति समूह में एक दुसरे के समर्थक होते हैं। आम राय – यह वह निर्णय है जिसमें सभी लोगों की सहभगिता होती है और सहमति बनायी जाती है। बहुमत निर्णय – जिसमें समूह के अधिकतर सदस्य किसी निर्णय के पक्ष में होते हैं। अल्पमत निर्णय – कई बार कुछ सदस्य किसी निर्णय के पक्ष में दबाव बनाते हैं यह दबाव अल्पसंख्या सदस्यों द्वारा बनाया जाता है। अचानक धप्प से – एक सदस्य समूह की तरफ से अचानक ही निर्णय कर लेता है। इस निर्णय में कोई एक व्यक्ति कुछ सुझाव देता है और बाकी सभी लोग उस सुझाव देता है और बाकी सभी लोग उस सुझाव को उदासीनता से मान लेते हैं। निर्णय का क्रियान्वयन निर्णय के क्रियान्वयन में आम राय से किए गए निर्णय समूह को अपने साथ जोड़े रखते हैं और क्रियान्वयन का सहज बनाते हैं। जबकि स्वनिर्धारित निर्णय क्रियान्वयन के समय कठिनाई पैदा करते हैं। काल्पनिक आम राय अर्थात वह निर्णय जो कि देखने में लगते हैं कि आम राय हैं किन्तु क्रियान्वयन करने में कठिनाई पैदा करते हैं क्योंकी वास्तविकता में उस निर्णय में सबकी सहमति नहीं होती है। मतभेद निपटारा समूह के जीवन चक्र में सदस्यों के बीच मतभेदों का होना स्वभाविक ही है। समूह सदस्य अलग- अलग पृष्ठभूमि, अनुभव, दृष्टिकोण, मूल्यों से जुड़े होते हैं। इसके अतिरिक्त समूह सदस्यों के व्यक्तिगत स्वार्थ, महत्वकांक्षायें भी होती हैं। ऐसी परिस्थिति में निर्णय लेने में, समस्या निवारण में उपयुक्त चुनाव करनेमें और समय- असमय मतभेद प्रकट होते रहते हैं। कई बार यह मतभेद ससामान्य समूह प्रक्रिया में अपने आप ही निपट जाते हैं, लेकिन कई बाद इनके पीछे तीव्र भावनाएं होती हैं और इसके चलते मतभेद गहरा रूप धारण कर लेते हैं यहाँ तक की समूह की प्रक्रियाओं को बाधित करने लगते हैं। जब एक व्यक्ति ही किसी समस्या का समाधान के लिए कई विकल्पों के बारे में सोचता है तो एक बड़ा समूह एक समस्या को लेकर अनेकों विकल्पों के बारे में सोचेगा ही। ऐसी स्थिति में विकल्प के चुनाव में कठिनाइयाँ आती हैं। सदस्य अपने मूल्यों, दृष्टिकोण, निजी स्वार्थ इत्यादी में समझौता करने को तैयार नहीं होते। इसके अलावा महिलाओं और पुरूषों के दृष्टिकोण, समस्याओं लाभ में भी अंतर होता है, अर्थात मतभेद मसहू में होंगे ही । महत्वपूर्ण यह है कि मतभेद समूह प्रक्रिया को बाधित न करें और समूह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहे। समूह में मतभेद के प्रमुख कारण निम्न हैं सदस्यों की अलग- अलग पृष्ठभूमि। सदस्यों के अलग मूल्य एव दृष्टिकोण। निजी स्वार्थ तरह – तरह के विकल्पों की सम्भावनाएं। नेतृत्व का प्रभाव मतभेद निपटारा एक आवश्यक प्रक्रिया है। कई महत्वपूर्ण मतभेदों पर जब खुलकर चर्चा नहीं होती तो वह न समाप्त होते हैं, और न ही प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होते हैं। ऐसी परिस्थिति में यह समूह प्रक्रिया को अंदर ही अंदर बाधित करते रहते हैं। दूसरी तरफ जैसे ही एक मतभेद समाप्त होता है कोई दूसरा शुरू हो जाता है साथ-साथ तीसरा चौथा, अत: यह एक सतत प्रक्रिया है। इसलिए मतभेद और उसके निपटारे को एक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। महत्वपूर्ण यह है कि मतभेदों को एक सकारात्मक प्रक्रिया के रूप में देखा जाए। यह भी हमेशा समझे कि समूह में मतभेद उभरेंगे ही। मतभेद निवारण के ऐसे तरीके अपनाए जाए जो कि अधिकतर समूह सदस्यों को मान्य हो। मतभेद के प्रबंधन के कुछ सम्भावित तरीके प्रतिस्पर्धा सा भाव पैदा करना जब परिणाम बहुत महत्वपूर्ण हो. मतभेद निपटारे में महत्वपूर्ण समय नष्ट जो रहा हो और टीमवर्क बाधित हो, टीम में प्रतिस्पर्धा का भाव पैदा करके, एक पक्ष को अनदेखा करके। मतभेद के बिन्दु को प्रत्यक्ष करके सामुहिक चर्चा और सभी विकल्पों को समझना समूह का परिणामों से जुड़ावअधिक, लंबा समय लगता है। समझौता किसी भी एक पक्ष के अपेक्षा सभी प्रतियोगियों के कुछ विकल्प आ जाएँ। अनदेखा करना यह मतभेदों को कुछ समय के लिए हटा देता है लेकिन इससे मतभेद निपटते नहीं। कुछ समय के लिए तनाव कम हो जाता है। समायोजित वह मुद्दे जो बहुत महत्वपूर्ण नहीं हो, यह तरीके मतभेद निपटारे के लिए अच्छा हो सकता है। मतभेद निपटारे की प्रक्रिया नेतृत्व व समूह सदस्यों की विश्लेषण क्षमता व मतभेद की परिस्थिति पर निर्भर करेगा किन्तु मतभेद को सही प्रकार से समझना महत्वपूर्ण है, अन्यथा या तो मतभेद, समूह प्रक्रिया और सीख को बाधित करते रहेंगे या फिर हम आवश्यकता से अधिक समय मतभेद निपटारे पर लगायेंगे। दोनों ही परिस्थितियों में समूह की समान्य गतिविधियाँ और लक्ष्य पीछे रह जाएंगे। मतभेदों के निपटारे के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं – मतभेद के कारण मतभेद के पीछे व्यक्ति काई बार मतभेद प्रत्यक्ष रूप से कहीं ओर दिखता है लेकिन उसके कारण कहीं ओर छिपे होते हैं। उदाहरणत: समूह में किन्हीं दो विकल्पों पर निर्णय लेने में मतभेद उभर सकता है। लेकिन हो सकता है कि उसका वास्तविक कारण नेतृत्व के लिए संघर्ष हो। अर्थात मतभेद को निपटाने के लिए सही मुद्दे तक पहूँचना बहुत आवश्यक है अन्यथा हम काल्पनिक मूद्दों में उलझ जायेंगे। दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है मतभेद के पीछे वास्तविक व्यक्ति। कई बार वास्तविक व्यक्ति प्रत्यक्ष नहीं होते या फिर प्रशिक्षक वास्तविक व्यक्ति से चर्चा नहीं करता। ऐसी परिस्थिति में मतभेद और भी बढ़ सकता है। स्त्रोत: राज्य ग्रामीण विकास संस्थान, झारखंड सरकार