भूमिका कृषि की तरह पशुपालन में भी विभिन्न सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के परिवारों की एक बड़ी संख्या संलग्न है । ग्राम पंचायत में पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए, बुनियादी ढांचे को अच्छा समर्थन देने के प्रयास शुरू किए जाने चाहिए । इसके लिए एक उत्पादक और अच्छी तरह से प्रबंधित चरागाह, और पर्याप्त संदूषण मुक्त सार्वजनिक पीने के पानी की सुविधा और ऋण, पशुपालन विभाग, प्रशिक्षित संसाधन व्यक्तियों की सेवाओं और बाजार तक पहुंच शामिल है। इस दिशा में ग्राम पंचायत को एक सुनियोजित तरीके से कार्य आरंभ करने की जरूरत है । इन सभी गतिविधियों का क्रियान्वयन करते समय यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि हम सामाजिक और समानता के मुद्दों को पर्याप्त रूप से संबोधित कर रहे हैं । यह समाज के सभी वर्गो और क्षेत्रों से परिवारों की भागीदारी की जरूरत है इसलिए इसमें समाज के सभी वर्गों और सभी परिवारों का भाग लेना आवश्यक है । पशुपालन के लिए समग्र योजना ग्राम पंचायतों को आरंभ की जाने वाली विभिन्न गतिविधियों के लिए सभी हितधारकों के साथ योजना बनाने की जरूरत है । ग्राम पंचायत द्वारा लिए गए सामूहिक निर्णय और मानदंडों का पालन करते हुए चारा सुरक्षा, आनुवंशिक और नस्ल सुधार, टीकाकरण, डीवर्मिग और पशुओं के स्वास्थ्य की देखभाल की दिशा में प्रयास कर सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त किया जा सकता है । समुदाय की प्रभावी सहभागिता सुनिश्चित की जानी जरूरी है । चरागाह भूमि प्रबंधन ग्राम पंचायतों में उपलब्ध चरागाह भूमि या साझा भूमि का पशुओं की चराई के लिए उपयोग किया जाता है । देश भर में इन आम संसाधनों पर अतिक्रमण देखा गया है । इसके अलावा, खुली चराई के लिए उपलब्ध आम भूमि को कम कर इस भूमि में से कुछ को फिर से वितरित किया गया है । ग्राम पंचायत चरागाह भूमि से अतिक्रमण हटाने और चरागाह भूमि के विकास की गतिविधियों को शुरू कर सकता है । अतिक्रमण हटाए जाने के दौरान, ग्राम पंचायत को प्रारंभिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है । इसलिए ऐसे किसी भी उपाय पर कार्रवाई को शुरू करने से पहले ग्राम सभा में चर्चा की जाना आवश्यक है । रुकावटों को पार करते दुधिया ग्राम पंचायत के अनुभव चरागाह भूमि के अतिक्रमण हटाने के प्रयासों का विरोध किया गया था । किसी ने भी विनियमित चराई नियम का पालन नहीं किया । ग्राम सभा को फिर से बुलाया गया था और पशुपालन में सुधार के लिए आवश्यक विभिन्न गतिविधियों को शुरू करने के लिए सर्वसम्मती से निर्णय लिया गया । ग्राम सभा के सदस्यों ने ग्राम पंचायत को अपने समर्थन और भागीदारी का आश्वासन दिया । यह भी निर्णय लिया गया कि प्रयास समावेशी होने चाहिए । इसी तरह यह भी निर्णय लिया गया की ग्राम पंचायत की इस पहल से सभी घरों विशेषकर महिलाओं की चिंताओं का समाधान व लाभ सुनिश्चित किया जाएगा । ग्राम पंचायतें मनरेगा और वन विभाग के कार्यक्रमों के अंतर्गत सामाजिक वानिकी सहित वनीकरण गतिविधियों को शुरू कर सकती हैं । सभी हितधारकों को शामिल कर एक उचित चारा विकास और वितरण तंत्र विकसित किया जाना चाहिए । जल निकायों का रखरखाव और कायाकल्प पीने के पानी की उचित सुविधा के अभाव में जहाँ पशुओं को पीने का पानी उपलब्ध कराया जा सकता है पशु अक्सर दूषित स्त्रोतों से पानी पीते है जो आमतौर पर रुग्णता और फलस्वरूप उत्पादकता में नुकसान का कारण बनता है । ग्राम पंचायत मौजूदा जल निकायों के रखरखाव और कायाकल्प के साथ-साथ पीने के पानी (प्लेटफार्मों आदि) के नए स्त्रोतों के निर्माण के लिए कार्य कर सकती हैं । साथ ही, ग्राम पंचायत जल स्त्रोतों को दूषित होने से रोकने में ग्राम सभा के सदस्यों में कर्त्तव्यों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए प्रयास आरंभ कर सकते हैं । खुले में शौच और जल निकायों के पास अपशिष्टों और मृत पशुओं के निपटान पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायत कुछ उपाय आरंभ कर सकती है । अभिसरण (वित्तीय संस्थानों, पशु चिकित्सा विभाग और दुग्ध सहकारी संघ) ग्राम पंचायतें वित्तीय संस्थान तक ग्रामीणों की पहुंच बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है । वे पशुपालन विभाग, परिवारों के लिए अधिक सुलभ दुग्ध सहकारी समितियों और प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण संस्थानों का निर्माण कर सकती हैं । कभी-कभी परिवारों को स्थानीय दूध विक्रेताओं के चंगुल में फंसा पाया जाता है, जो उन्हें कम दर पर दूध बेचने के लिए मजबूर करते हैं । इसी तरह, संकट के समय, कुछ घरों अपने पशुओं को बेचने के लिए मजबूर हो जाते है । अक्सर, संकट और ऋणग्रस्तता के कारण, इन परिवारों में अच्छी सौदेबाजी की शक्ति नहीं होती और ये प्रचलित बाजार दर से कम कीमत पर दूध बेचते हैं । बैंकों और सहकारी समितियों से जुड़ाव इन परिवारों की स्थिति को मजबूत कर सकता है । प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और जागरूकता निर्माण जागरूकता की कमी पशु पालन से कम लाभ होने के कारणों में से एक है । लोगों में पशुओं के पोषण, रोग नियंत्रण, टिकाकरण, प्रजनन और सामान्य स्वास्थ्य देखभाल के बारे में अपर्याप्त जागरूकता और समझ है। पशुपालन प्रथाएं भी मिथकों और अंधविश्वासों से प्रभावित हैं। इससे कई बार आर्थिक नुकसान के साथ ही पशुओं के स्वास्थ्य और जीवन का भी नुकसान होता है । इसलिए, ग्राम पंचायत को जागरूकता सुनिश्चित करने की योजना बनाने के प्रयास करने चाहिए। ग्राम पंचायत के इच्छुक व्यक्तियों का प्रशिक्षण शुरू करने के लिए पशु पालन विभाग से संपर्क किया जा सकता है । सुश्री आशा किरण, वार्ड सदस्य और ग्राम पंचायत में तैनात पशुपालन विभाग पदाधिकारी सहित 15 सदस्यों की एक स्थायी समिति का गठन किया गया था । सुश्री आशा किरण, और श्री किशन गोपाल को पशुपालन पर प्रशिक्षण के लिए भेजने के ग्राम पंचायत के प्रस्ताव की ग्राम सभा द्वारा मंजूरी व अनुशंसा की गई । प्रशिक्षण के बाद गाँव में वापसी पर उन्होंने पशुपालन के विभिन्न पहलुओं पर ग्रामीणों की जागरूकता और क्षमता निर्माण का कार्यक्रम चलाया । बैठक के लिए सप्ताह में एक दिन तय किया गया था और परिवारों को इन बैठकों में भाग लेने (सभी बैठकों में एक ही सदस्य) के लिए सूचित किया गया, जिनमें पशुपालन विभाग के प्रतिनिधि भी नियमित रूप से भाग लेते हैं। प्रत्येक बैठक में चर्चा करने के बाद ग्राम पंचायत ने निर्णय लिया और पिछली बैठकों की कार्रवाई के अनुपालन की समीक्षा की । समता और पहुंच सुनिश्चित करना पशुपालन गतिविधियों को सफल बनाने के लिए, ग्राम पंचायत को अपनी सभी गतिविधियों में समता और पहुंच सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है । ग्राम पंचायत को सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके हस्तक्षेप से समाज के सभी वर्गो को लाभ हो । उदाहरण के लिए, ग्राम पंचायत को चरागाह विकास, पशुओं के लिए पेयजल की सुविधा, टीकाकरण और प्रशिक्षण आदि गतिविधियों को सभी के लिए समान रूप से सुलभ कराने के प्रयास करने चाहिए । घर के अधिक दूरी, या कोई भी अन्य सामाजिक या आर्थिक आयाम किसी भी परिवार के लिए वित्तीय संस्थानों, दुग्ध सहकारी संघों या पशुपालन विभाग से लाभ प्राप्त करने में बाधित न करें । ग्राम पंचायत को पशुपालन से संबंधित सभी फैसलों और गतिविधियों में सभी की पहुंच सुनिश्चित करनी चाहिए । पशुओं से रोजमर्रा की रखरखाव की जिम्मेदारी अक्सर महिलाओं पर डाल दी जाती है । उन्हें बकरियों या अन्य जानवरों की देखभाल करनी होती है, जिसके लिए कुछ लड़कियां स्कूल नहीं जा पाती है । लेंकिन निर्णय लेने, विपणन और प्रशिक्षण में महिलाओं को उपयुक्त भूमिका नहीं दी जाती है । इसलिए ग्राम पंचायत द्वारा गतिविधियों पर निर्णय लेने, पशुपालन पर हस्तक्षेप और प्रशिक्षण में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए । पशुपालन पर ग्राम पंचायत का प्रयास अन्य सभी उपायों की तरह सभी जाति समूहों के लिए समावेशी होना चाहिए । यह पशुपालन हस्तक्षेपों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ जाति समूह विशेष प्रकार के पशुओं के पालन में शामिल हैं । इसलिए ग्राम पंचायत का डेयरी, मुर्गी पालन, मछली पालन और सुअर पालन जैसे पशुओं के विभिन्न प्रकारों पर एक साथ काम करना महत्वपूर्ण है । महामारी के दौरान ग्राम पंचायत की भूमिका संक्रामक रोग के बड़े पैमाने पर फैलने, बड़े पैमाने पर मृत्यु होने और प्राकृतिक आपदाओं जैसी महामारी के दौरान ग्राम पंचायतों को एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है । ऐसे समय में, ग्राम पंचायत को सुनिश्चित करना चाहिए - संक्रमित/बीमार पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग किया जा रहा है । मृत पशुओं के शवों के उचित निपटान के माध्यम से यह सुनिश्चित करें कि कुत्ते, कौवे आदि मृत पशुओं को खा न सकें। इससे रोग फ़ैल सकता है । लोगों द्वारा मरे हुए पशुओं का उपभोग नहीं किया जाए। सुनिश्चित करें कि मृत पशु के चारे और सुखी घास को जला दिया गया है । कीड़े, मक्खियों, पिस्सुओं, घुनों और मच्छरों को नियंत्रित करें क्योंकि वे संक्रामक रोगों का प्रसार कर सकते हैं । अगर पड़ोसी ग्राम पंचायतों में प्रकोप की सूचना मिलती है तो तत्काल निवारक टीकाकरण करें । क्षेत्र में स्थानिक रोगों और इनकी रोकथाम के बारे में जानकारी का प्रसार । स्थायी समिति उपरोक्त गतिविधियों के लिए ग्राम पंचायत द्वारा पशुपालन/पशु सुधारक समिति पर एक स्थायी समिति का गठन किया जा सकता है । स्थायी समिति का ततं राज्य के पंचायती राज अधिनियम के अनुसार किया जा सकता है । उदाहरणार्थ महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1958 के अनुसार, ग्राम पंचायत एक पशु पालन/सुधार समिति गठित कर सकती है । समिति में सदस्यों की संख्या 12-24 तक हो सकती है। समिति में कम से कम तीन निर्वाचित सदस्यों के साथ-साथ सरकारी पदाधिकारी तथा ग्राम पंचायत के स्वयंसेवक समिति के सदस्य हो सकते हैं । समिति को विभिन्न कार्य सौंपे जा सकते है और समय-समय पर ग्राम पंचायत द्वारा इसके कार्यों की समीक्षा की जाएगी। पशुपालन को लाभकारी कैसे बनाएं उत्पादकता में वृद्धि से लाभप्रदता बढ़ जाती है। इसलिए, निम्नलिखित उद्देश्यों को पूरा करने की आवश्यकता है - स्वस्थ शावक का जन्म नवजात शावक का शीघ्र विकास लगातार दो प्रजनन/शावक/मेमने का जन्म के बीच कम अंतराल अधिकतम प्रजनन/शावक/मेमने का जन्म जीवनकाल न्यूनतम विर्यारोपण के साथ गर्भाधान हरे चारे के प्रयोग से कैसे बढ़ सकता है दूध का उत्पादन, देखिये इस विडियो में स्रोत: पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार