खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग की योजना स्कीमें 2014-15 इस प्रकार से हैं :- भा.खा.नि./राज्य सरकार द्वारा गोदामों का निर्माण यह विभाग पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू–कश्मीर तथा अन्य चुनिंदा राज्यों में भंडारण क्षमता के संवर्धन के लिए एक योजना स्कीम कार्यान्वित कर रहा है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में आर्थिक मामलों से संबंधित मंत्रिमंडल समिति ने 530.00 करोड़ रुपए के निवल आवंटन के साथ 597.26 करोड़ रुपए की लागत की परियोजना अनुमोदित की है, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं- सिक्किम सहित पूर्वोत्तर क्षेत्र में 37 स्थानों पर 2,92,730 टन क्षमता। अन्य चार राज्यों में 9 स्थानों पर 76,220 टन क्षमता अनुदान सहायता का प्रयोग करते हुए पूर्वोत्तर क्षेत्र तथा जम्मू कश्मीर में 75 स्थानों पर मध्यमवर्ती भंडारण क्षमता दो वर्षों अर्थात 2012-13 और 2013-14 के दौरान 72.32 करोड़ रुपए के व्यय से कुल 27070 टन की क्षमताएँ सृजित की गयी । टीपीडीएस प्रचालनों का एक सिरे से दूसरे सिरे तक कम्प्यूटरीकरण इस विभाग ने खाद्यान्नों की चोरी और अन्यत्र उपयोग, नकली और जाली राशन कार्ड, पारदर्शिता की कमी, कमजोर शिकायत निपटान तंत्र आदि जैसी चुनौतियों का समाधान करने के लिए टीपीडीएस के एक सिरे से दूसरे सिरे तक कम्प्यूटरीकरण सहित आधुनिकीकरण का कार्य शुरू किया है। टीपीडीएस के कम्प्यूटरीकरण के लिए की गई कुछ प्रमुख पहलें निम्नलिखित हैं- विभाग 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) के अंतर्गत राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के साथ लागत-साझेदारी आधार पर टीपीडीएस प्रचालनों के एक सिरे से दूसरे सिरे तक कम्प्यूटरीकरण संबंधी योजना स्कीम कार्यान्वित कर रहा है। आर्थिक मामलों से संबंधित मंत्रिमंडल समिति ने अक्तूबर, 2012 में स्कीम घटक-1 को अनुमोदित किया है जिसे 2012-17 के दौरान 884.07 करोड़ रुपए का वित्तोषण आवश्यक था, जिसमें भारत सरकार का हिस्सा 489.37 करोड़ रुपए और राज्य/संघ राज्य क्षेत्र का हिस्सा 394.70 करोड़ रुपए है। इसकी लागत पूर्वोत्तर राज्यों के संबंध में 90:10 आधार पर और अन्य राज्यों के संबंध में 50:50 आधार पर वहन की जा रही है। स्कीम के घटक-1 में राशन कार्डों/लाभार्थियों और अन्य डाटाबेसों का डिजिटीकरण, आपूर्ति-श्रृंखला प्रबंधन का कम्प्यूटरीकरण, पारदर्शिता पोर्टलों की स्थापना और शिकायत निपटान तंत्रों का गठन जैसी गतिविधियां शामिल हैं। जहां तक घटक-2 अर्थात एफपीएस स्वचालन, देश में आधार और राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीकरण (एनपीआर) नामांकन में हुई प्रगति, एफपीएस पर कनेक्टिविटी की उपलब्धता आदि, का संबंध है, विभाग उचित समय पर स्थिति की समीक्षा करेगा। विभाग ने 10.12.2012 को सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को इस स्कीम का प्रशासनिक अनुमोदन सम्प्रेषित कर दिया है। इस स्कीम के अंतर्गत राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) तकनीकी भागीदार है। वर्ष 2012-13 के दौरान इस स्कीम के लिए 41.69 करोड़ रुपए आबंटित किए गए थे जिसे अब तक 7 राज्यों, एनआईसी आदि को संवितरित किया गया है। वर्ष 2013-14 (संशोधित अनुमान) में 188.76 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई है जिसमें से दिनांक 31.03.2014 तक 187.05 करोड़ रुपए की राशि पिछले वर्ष कवर किए गए 3 राज्यों सहित 19 राज्यों, एनआईसी आदि को जारी की गई है। इस स्कीम के तहत किए गए व्यय का विवरण अनुबंध-1 में दिया गया है। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के प्रचलनों के कंप्यूटरीकरण तथा आवश्यक वस्तुओं की स्मार्ट कार्ड आधारित सुपुर्दगी से संबन्धित पाइलट स्कीमें उपर्युक्त स्कीम में समाहित कर दी गई हैं। टीपीडीएस से संबंधित सभी आंकड़ें और सूचनाएं सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने के उद्देश्य से टीपीडीएस के लिए एक राष्ट्रीय पारदर्शिता पोर्टल का विकास किया गया है। सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को टीपीडीएस एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर के प्रयोग के माध्यम से पोर्टल पर आंकड़ों का अनुरक्षण और अद्यतन करने का अनुरोध किया गया है। पारदर्शिता पोर्टल http://pdsportal.nic.in पर उपलब्ध है। सभी नागरिक उपलब्ध लिंक के जरिए संबंधित राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों के खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभागों के पोर्टल पर जा सकते हैं। इस संबंध में आ रही समस्याओं आदि के बारे में जानने के लिए राज्यों के साथ नियमित रूप से बैठकें आयोजित की जाती है। तकनीकी समस्याओं के समाधान के लिए एनआईसी द्वारा प्रत्येक राज्य में वीडियो कॉन्फ्रेंस/कार्यशालाएं भी आयोजित की जाती हैं। तकनीकी भागीदार होने के नाते एनआईसी इस परियोजना की ट्रैकिंग के लिए जिम्मेदार है। चूंकि यह एक मिशन मोड परियोजना (एमएमपी) है, इसलिए सचिव (खाद्य और सार्वजनिक वितरण) की अध्यक्षता वाली एक अधिकार-प्राप्त समिति और संयुक्त सचिव के अधीन गठित एमएमपी दल नियमित रूप से स्कीम की निगरानी कर रहे हैं। इसके अलावा, अपर सचिव-सह-वित्तीय सलाहकार की अध्यक्षता में एक वित्त समिति और महानिदेशक, एनआईसी तकनीकी का गठन संबंधित मुद्दों पर गौर करने के लिए किया गया है। राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के भीतर परियोजना की बारीकी से निगरानी के लिए सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को अपनी-अपनी राज्य शीर्ष समिति और राज्य परियोजना ई-मिशन दल गठित करने को कहा गया है। राज्य/संघ राज्य क्षेत्र सरकारों द्वारा दिनांक 31.03.2014 तक दी गयी सूचना के अनुसार घटक-1 के अंतर्गत विभिन्न गतिविधियों के कार्यान्वयन की स्थिति का ब्यौरा नीचे में दिया गया है। राष्ट्रीय शर्करा संस्था, कानपुर राष्ट्रीय शर्करा संस्था, कानपुर (जो खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग का एक अधीनस्थ कार्यालय है) देश का एक अग्रणी वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थान है, जो शर्करा प्रौद्योगिकी, शर्करा इंजीनियरी एवं औद्योगिक फेरमेंटेशन और अल्कोहल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में शिक्षण तथा प्रशिक्षण प्रदान करता है। यह संस्थान शर्करा प्रौद्योगिकी, शर्करा इंजीनियरी एवं अल्कोहल प्रौद्योगिकी में स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रम संचालित करता है। यह अल्पावधिक प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम भी चलता है जैसे शुगर ब्यायलिंग सर्टिफिकेट कोर्स, शुगर एंजिनियरिंग सर्टिफिकेट कोर्स तथा प्री हार्वेस्ट केन मेच्युरीटी सर्वे कोर्स। यह संस्थान शैक्षणिक सत्र 2014-15 से गुणवत्ता नियंत्रण सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम नामक एक नया पाठ्यक्रम भी शुरू कर रहा है। यह संस्थान शर्करा तथा संबद्ध क्षेत्रों में उन्नत अनुसंधान हेतु एक केंद्र भी है, जो विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा पीएचडी हेतु मान्यता प्राप्त है। इसका उद्देश्य चीनी कारखानों, डिस्टिलरियों, केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों और भारत के अन्य वाइग्यांक एवं तकनीकी संस्थानों के साथ संवाद बनाए रखना है। संस्थान द्वारा संचालित विभिन्न पाठ्यक्रमों में शैक्षणिक सत्र 2012-13 के दौरान 177 विद्यार्थियों एवं 2013-14 के दौरान 197 विद्यार्थियों को प्रवेश दिया गया। संस्थान एवं छात्रावास आदि के प्रशासनिक व्यय और संस्थान द्वारा चलाये जा रहे प्रायोगिक चीनी कारखाने तथा कृषि फार्म से संबन्धित प्रतिबद्ध व्यय गैर- योजना प्रावधानों से पूरे किए जाए हैं। योजना परिव्यय में केवल संस्थान में विकास से संबन्धित विभिन्न स्कीमों हेतु अनुसंधान उन्मुखी कार्यों संबंधी व्यय शामिल किए जाते हैं। योजना स्कीम के अंतर्गत व्यय राष्ट्रीय शर्करा संस्था, कानपुर के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए संस्वीकृत किया जाता है। राष्ट्रीय शर्करा संस्था ने वार्षिक योजना 2012-13 तथा 2013-14 की राशि फार्म सुविधाओं के सुधार, कार्यालय भवन के नवीकरण, सौर ऊर्जा संयंत्र की स्थापना और प्रयोगिक चीनी कारखाने की मरम्मत की प्रमुख मदों पर व्यय की है। भंडारण विकास तथा विनियामक प्राधिकरण (डब्ल्यूडीआरए) को सहायता भारत सरकार ने भांडागारण (विकास तथा विनियमन) अधिनियम, 2007 (2007 का 37) को लागू करके देश में निगोशिएबल वेअरहाउसिंग रसीद प्रणाली की शुरूआत की है जिसे दिनांक 25 अक्तूबर, 2010 से प्रभावी कर दिया गया है। निगोशिएबल वेअरहाउस रसीद (एनडब्ल्यूआर) प्रणाली औपचारिक रूप से दिनांक 26 अप्रैल, 2011 से प्रारंभ की गई थी। भांडागारण (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 2007 का मुख्य उद्देश्य भांडागारों के विकास एवं विनियमन, वेअरहाउस रसीदों की निगोशिएबिलिटी, भांडागारण विकास एवं विनियामक प्राधिकरण की स्थापना तथा इससे संबंधितों मामलों के लिए प्रावधान तैयार करना है। इस अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत भांडागारों द्वारा जारी निगोशिएबल वेअरहाउस रसीदों से किसानों को निगोशिएबल वेअरहाउस रसीदों पर ऋण लेने में सहायता मिलेगी तथा कृषि उपज की मजबूरी में बिक्री को रोका जा सकेगा। यह कई हितधारकों जैसे बैंकों, वित्तीय संस्थाओं, बीमा कंपनियों, व्यापार जगत, कमॉडिटी एक्सचेंजों के साथ-साथ उपभोक्ताओं के लिए भी लाभदायक होगा। डब्ल्यूडीआरए अपनी प्रारंभिक अवस्था में है तथा इसे निरंतर वित्तीय सहायता प्रदान की जानी है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान भांडागारों तथा प्रत्यायन एजेंसियों के पंजीकरण के नाममात्र पंजीकरण शुल्क के अलावा इसके राजस्व का अन्य कोई स्त्रोत नहीं है। योजना आयोग ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान भांडागारण विकास एवं विनियामक प्राधिकरण की सहायता संबंधी स्कीम को खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग की अन्य स्कीमों के साथ स्वीकार तथा शामिल कर लिया है। गतिविधियों की समीक्षा तथा विस्तृत जांच के पश्चात 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) के दौरान भांडागारण विकास एवं विनियामक प्राधिकरण का अनुमानित व्यय 50 करोड़ रुपए बनता है। भांडागारण विकास एवं विनियामक प्राधिकरण की गतिविधियां निगोशिएबल वेअरहाउस रसीद की अवधारणा के संबंध में किसानों तथा अन्य हितधारकों की मानसिकता को बदलने की दृष्टि से भांडागारण विकास एवं विनियामक प्राधिकरण ने व्यापक प्रचार कार्यक्रम प्रारंभ किया है जिसमें किसानों के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करना, प्रशिक्षकों, भांडागार प्रबंधकों, मान्यता प्रदान करने वाली एजेंसियों के अधिकारियों आदि के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आदि शामिल हैं। इसने भांडागारण विकास एवं विनियमन अधिनियम के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों तथा निगोशिएबल वेअरहाउस रसीद के संबंध में किसानों तथा अन्य जमाकर्ताओं के लाभ के लिए एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई है। भांडागारण विकास एवं विनियामक प्राधिकरण द्वारा इसके अलावा विवरण-पत्र, पैम्फलेट ृष्टि त किसानों तथा अन्य हित ,तथा बुलेटिन भी प्रकाशित किए जा रहे हैं। भंडागारण क्षेत्र में क्षमता निर्माण तथा दक्षता को बढ़ाने के लिए तथा केंद्रीय भंडारण निगम, राज्य भंडारण निगम तथा निजी भांडागारों के भांडागार प्रबंधकों के लिए देश के विभिन्न भागों में भंडागार कर्मचारी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। प्रत्यायन एजेंसियों के अधिकारियों को भंडागारों के प्रत्यायन की विस्तृत प्रक्रिया से परिचित कराने के लिए भंडागार विकास एवं विनियामक प्राधिकरण ने नई दिल्ली में दो प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं। डब्ल्यूडीआरए देश में इलैक्ट्रॉनिक निगोशिएबल वेअरहाउस रसीद प्रणाली लागू करने के लिए कार्य कर रहा है। इलैक्ट्रॉनिक वेअरहाउस रसीदों से सूचना का संचलन तेजी से होता है और लेखापरीक्षा स्वचालित तरीके से होती है। इलैक्ट्रॉनिक वेअरहाउस रसीद किसानों के लाभ के लिए बाधाओं को दूर कर सकती हैं और कृषि वस्तुओं के राष्ट्रीय बाजार का संवर्द्धन कर सकती है। इलैक्ट्रॉनिक वेअरहाउस रसीदों से समुचित ग्रेडिंग, निरीक्षण तथा भारमापन का संवर्द्धन होगा। डब्ल्यूडीआरए ने आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु तथा कर्नाटक में 43 पीसीएस वेअरहाउस पंजीकृत किए हैं। पंजीकृत वेअरहाउस किसानों को निगोशिएबल वेअरहाउस रसीदें जारी कर रहे हैं ताकि किसान भंडारित उपज के लिए रियायती ऋण का लाभ उठा सकें। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक तथा उड़ीसा की प्रत्यायन एजेंसियों से लगभग 700 आवेदन प्राप्त हुए हैं। शीत भंडारों में निगोशिएबल वेअरहाउस रसीद प्रणाली प्रारंभ करने से बागवानी उपज पैदा करने वाले उपजकर्ता/किसान भी पंजीकृत शीत भंडारों द्वारा जारी निगोशिएबल वेअरहाउस रसीद प्रणाली रसीदों के विरूद्ध रियायती ऋण का लाभ उठा सकते हैं। इससे बागवानी उपज पैदा करने वाले उपजकर्ता/किसानों के मध्य नकदी की उपलब्धता बढ़ेगी तथा वर्ष भर बाजारों में अच्छी गुणवत्ता वाले फल तथा सब्जियों की निर्बाध आपूर्ति की जा सकेगी। इसके अलावा बागवानी उपज में हो रही लगभग 30 प्रतिशत बर्बादी को कम किया जा सकेगा। इससे देश में बागवानी सहित कृषि के समेकित विकास तथा व्यवसायीकरण, प्रभावी पोस्ट–हार्वेस्ट प्रबंधन में भी सहायता मिलेगी। आंध्र प्रदेश तथा गुजरात से शीत भंडारों को मान्यता प्रदान करने तथा पंजीकरण के संबंध में आवेदन प्राप्त हुए हैं। भंडागार विकास एवं विनियामक प्राधिरण की भावी योजना भंडागार विकास एवं विनियामक प्राधिरण में पेशेवर स्टाफ की कमी के कारण वर्तमान में विविध गतिविधियां बाधित होती हैं। वर्तमान में विशेष रूप से ऋण: विपणन, कानूनी मामलों, सूचना प्रौद्योगिकी आदि के क्षेत्र में कोई अधिकारी नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी युक्त प्लैटफार्म तैयार होने, किसानों तथा अन्य हितधारकों में जागरूकता पैदा करने, किसानों/जमाकर्ताओं के बीच निगोशिएबल वेअरहाउस रसीद प्रणाली आकर्षक होने तथा प्रस्तावित स्टाफ की भर्ती हो जाने के पश्चात भांडागार विकास एवं विनियामक प्राधिरण पूरी तत्परता से निम्नलिखित गतिविधियों पर ध्यान देगा। प्रत्यायन एजेंसियों का पंजीकरण भंडागार विकास एवं विनियामक प्राधिरण द्वारा 16 प्रत्यायन एजेंसियों को पैनल में शामिल किया गया। में पैनल में शामिल की जाने वाली प्रत्यायन एजेंसियां निम्नानुसार रहीं हैं: प्रत्यायन एजेंसियों के भावी अनुमान 12वीं वार्षिक योजना के दौरान 2012-13 2013-14 2014-15 2015-16 2016-17 14 16 20 25 30 पंजीकृत भांडागारों की स्थिति तथा अगले पांच वर्षों में भावी अनुमान निम्नानुसार है: पंजीकृत भांडागार/क्षमता उपयोग के संबंध में भावी अनुमान 2012-13 2013-14 2014-15 2015-16 2016-17 1500 4000 6000 8000 10,000 25% से अधिक 40% से अधिक 50% से अधिक 60% से अधिक 75% से अधिक इस अधिनियम के अनुसार भांडागारों का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है तथा केवल वे भांडागार जिनके लिए निगोशिएबल वेअरहाउस रसीदें जारी करना चाहते हैं उन्हें भांडागारण विकास एवं विनियामक प्राधिकरण से पंजीकरण प्राप्त करना अपेक्षित है। अत: इस पंचवर्षीय योजना में उपर्युक्त अनुमानों का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि वर्ष 2013-14 के दौरान भंडागारों के पंजीकरण की प्रक्रिया बहुत धीमी है। ऐसे कुछ ही वेअरहाउस मालिक हैं जो भंडागारण विकास एवं विनियामक प्राधिकरण के मानदंडों को पूरा करते हैं तथा निगोशिएबल वेअरहाउस रसीदें जारी करने के इच्छुक हैं। अत: संशोधित अनुमान को निम्नानुसार माना जाए:- 2012-13 2013-14 2014-15 2015-16 2016-17 300 400 800 1200 1800 सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ बनाना तथा क्षमता निर्माण, गुणता नियंत्रण, परामर्श सेवाएं तथा अनुसंधान सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ बनाना तथा क्षमता निर्माण लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभभोगियों के बीच उनकी हकदारी तथा शिकायत निवारण तंत्र के संबंध में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को वित्तीय सहायता। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के संबंध में योजना स्कीम के घटक के अंतर्गत लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभभोगियों को उनकी हकदारी तथा शिकायत निवारण तंत्र के संबंध में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। स्कीम के इस घटक का मुख्य उद्देश्य एक प्रभावी, कुशल, सतत धारणीय तथा गहन जागरूकता अभियान प्रारंभ करना है जिसका प्रभाव शहरी के साथ-साथ ग्रामीण तथा दूरदराज के क्षेत्र तक पहुंच सके। प्रचार अभियान के अंतर्गत लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का व्यापक प्रचार किया जाता है ताकि लाभभोगी स्कीम के संबंध में जागरूक होकर इनका लाभ उठा सके। प्रिंट मीडिया तथा निजी टीवी तथा रेडियों चैनलों तथा डीएवीपी/प्रसार भारती/दूरदर्शन अनुमोदित दरों पर दूरदर्शन तथा ऑल इंडिया रेडियो पर प्रचार सहित जागरूकता अभियान चलाने के संबंध में राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के लिए विस्तृत मार्गदर्शन दिए गए हैं। राज्य सरकार इस अभियान में होने वाले व्यय का 20 प्रतिशत राशि का वहन करती है तथा शेष 80 प्रतिशत राशि का वहन भारत सरकार द्वारा किया जाता है तथा राशि प्रत्येक 40 प्रतिशत की दो किस्तों में जारी की जाती है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में अनुदान सहायता लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभभोगियों में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए वित्तीय सहायता। इस स्कीम का उद्देश्य पूर्वोत्तर क्षेत्र में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभभोगियों में जागरूकता पैदा करना है। राज्य/संघ राज्य क्षेत्र सरकारों से प्रस्ताव प्राप्त होने पर निधियां जारी की जाती हैं। क्षमता निर्माण (क) सार्वजनिक वितरण प्रणाली – मूल्यांकन, मानीटरिंग और अनुसंधान इस योजना के तहत लक्षित लाभभोगियों पर लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के प्रभाव का मूल्यांकन करने और लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के कार्यान्वयन में कमियों को दूर करने के लिए विभाग द्वारा लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के कार्यकरण से संबंधित मूल्यांकन अध्ययन कराए जाते हैं। (लाख रुपए में) योजना का नाम वित्तीय वर्ष बजट अनुमान संशोधित अनुमान वास्तविक व्यय सार्वजनिक वितरण प्रणाली – मूल्यांकन, मानीटरिंग और अनुसंधान 2012-13 40 40 - 2013-14 62 31 31 (ख) सार्वजनिक वितरण प्रणाली – प्रशिक्षण इस योजना का उद्देश्य राज्य खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग तथा राज्य नागरिक आपूर्ति निगम, उपभोक्ता सहकारी समितियों आदि जैसी राज्य एजेंसियों में विभिन्न स्तरों के अधिकारियों के लिए लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा इससे संबंधित नीतिगत मुद्दों पर प्रशिक्षण कार्यक्रम और व्याख्यान, सेमिनार तथा कार्यशालाएं चलाकर लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के कार्यकरण और कार्यान्वयन में लगे कार्मिकों की कार्य कुशलता को बढ़ाना और उसका उन्नयन करना है। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अधिक प्रभावी और कुशल बनाने के लिए उचित दर दुकानों के मालिकों, गैर-सरकारी संगठनों, पंचायती राज संस्थाओं, ग्रामीण/शहरी सतर्कता समितियों के सदस्यों एवं भारतीय खाद्य निगम के अधिकारियां को भी प्रशिक्षण दिया जाता है। इस योजना के तहत केंद्रीय सरकार 500 रूपये प्रति प्रशिक्षणार्थी प्रतिदिन की दर से वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। प्रति प्रशिक्षण कार्यक्रम अधिकतम सहायता 50,000 रूपये है तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम की अधिकतम अवधि 5 कार्यदिवस है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 का सफलतापूर्वक कार्यान्वयन करने के उद्देश्य से इस योजना के तहत प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं ताकि राज्य सरकारों/संघ राज्य क्षेत्र प्रशासनों, भारतीय खाद्य निगम के महत्वपूर्ण कार्मिकों और भारतीय खाद्य निगम अथवा अन्य एजेंसी के माध्यम से राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों आदि द्वारा नामित मास्टर ट्रेनर्स को इस संबंध में जागरूक बनाया जा सके। योजना का नाम वित्तीय वर्ष बजट अनुमान संशोधित अनुमान वास्तविक व्यय सार्वजनिक वितरण प्रणाली – प्रशिक्षण 2012-13 50 50 50 2013-14 62 42.03 38.46 5 (II) परामर्शी सेवाएं, प्रशिक्षण एवं अनुसंधान खाद्यान्नों के लिए घरेलू/वैश्विक बाजारों में अनुसंधान/मानीटरिंग हेतु परामर्शी सेवाएं यह योजना स्कीम: परामर्शी सेवाएं, प्रशिक्षण एवं अनुसंधान का एक घटक है जिसे वर्ष 2007 से खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग के नीति-1 अनुभाग द्वारा कार्यान्वित किया जाता है। खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग द्वारा भारतीय खाद्य निगम को यह कार्य सौंपा गया है कि वह बाजार आसूचना प्रणाली स्थापित करने के उद्देश्य से एक परामर्शदाता नियुक्त करें जो नियमित मूल्य स्थिति और आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में संभावित वृद्धि की पूर्व चेतावनी दे सके जो नीतिगत निर्णयों के लिए महत्वपूर्ण है। योजना के इस घटक का उद्देश्य बाजार आसूचना प्रणाली स्थापित करना है जो नियमित मूल्य स्थिति और आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में संभावित वृद्धि की पूर्व चेतावनी देश के जो कि नीतिगत उपायों तथा खाद्य अर्थव्यवस्था के प्रबंधन में हस्तक्षेप के लिए महत्वपूर्ण है। इस प्रकार की बाजार संबंधी आसूचना खाद्यान्नों, चीनी और खाद्य तेलों के लिए आयात-निर्यात नीति के निर्धारण में भी महत्वपूर्ण है। अध्ययन के माध्यम से तैयार की गई रिपोर्टों में गेहूं, चावल, चीनी और खाद्य तेलों का आवधिक मूल्य डाटा मुहैया कराया जाता है। नियमित मूल्य एलर्ट और आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों मे संभावित वृद्धि की अग्रिम सूचना प्राप्त करने के उद्देश्य से खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग ने खाद्यान्नों के लिए घरेलू/वैश्विक बाजारों में अनुसंधान/मानीटरिंग हेतु एक परामर्शदाता को नियुक्त किया था। मैसर्स इंडियन एग्रीबिजनेस सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली को 28.3.2012 से दो वर्ष की अवधि के लिए भारतीय खाद्य निगम तथा उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के परामर्शदाता के रूप में नियुक्त किया गया था। परामर्शदाता की संविदा को उन्हीं शर्तों के आधार पर 28.3.2014 से अगले एक वर्ष के लिए 27.3.2015 तक बढ़ा दिया गया है। परामर्शदाता द्वारा उपलब्ध कराए गए डाटा का उपयोग गेहूं तथा चावल के साथ-साथ चीनी और खाद्य तेलों के मौजूदा घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों की समीक्षा के लिए किया जा रहा है। ई-गवर्नेंस कर्मचारियों, नागरिकों और विभाग के बीच बेहतर तथा सार्थक सम्पर्क बनाए रखने के लिए और कार्य को कागजों के बजाय इलेक्ट्रानिक प्रणालियों में निपटाने के उद्देश्य से विभाग इंटरनेट जैसे आईसीटी उपकरणों का उपयोग करके ई-गवर्नेंस को कार्यान्वित करने में गहन रुचि ले रहा है ताकि विभिन्न सरकारी गतिविधियां चलाई जा सकें। यह विभाग विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आधुनिकतम एप्लीकेशन साफ्टवेयर विकसित/कार्यान्वित करने का कार्य निरंतर कर रहा है। ई-गवर्नेंस के क्षेत्र में निम्नलिखित पहलें की गई हैं:- आईसीटी की आधारभूत संरचना और एलएएन का अपग्रेडेशन ई-कार्यालय, फाइल ट्रैकिंग प्रणाली, ई-सेवा पुस्तिका और पे-रोल साफ्टवेयर का कार्यान्वयन साइबर सुरक्षा नीतियों का कार्यान्वयन ई-ग्रंथालय, पुस्तकालय प्रबंधन प्रणाली, संसदीय कार्य प्रबंधन प्रणाली, आरटीआई अनुरोध एवं अपील प्रबंधन सूचना प्रणाली, न्यायालय मामले मानीटरिंग प्रणाली और हार्डवेयर शिकायत मानीटरिंग प्रणाली शुरू की गई है। खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग की वैबसाइट को पुन: डिजाइन किया गया है। आईसीटी के विभिन्न उपकरणों और एफटीएस, न्यायालय मामले मानीटरिंग प्रणाली आदि जैसे एप्लीकेशन साफ्टवेयर के उपयोग के बारे में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया गया है। वनस्पति, वनस्पति तेल तथा वसा की प्रयोगशालाओं में अनुसंधान एवं विकास तथा आधुनिकीकरण वनस्पति, वनस्पति तेल तथा वसा निदेशालय अपनी प्रयोगशाला में अनुसंधान एवं विकास तथा आधुनिकीकरण की एक योजना स्कीम चला रहा है। मूल रूप से इस योजना स्कीम का उद्देश्य तेल वाले पदार्थों से अधिक मात्रा और गुणवत्ता की दृष्टि से तेल तथा सह-उत्पादों की रिकवरी में सुधार करना है। इन तेलों के उत्पादन में वृद्धि के लिए किसी एक कारक की ओर संकेत करना संभव नहीं है। इस वृद्धि के लिए योजनागत प्रयासों सहित अनेक कारकों की भूमिका है। अनुसंधान एवं विकास योजना का व्यापक उद्देश्य है प्रौद्योगिकी के विकास के लिए समन्वित एवं संकेंद्रित अनुसंधान के प्रयास करना ताकि तेल वाले पदार्थों से तेल के उत्पादन में वृद्धि की जा सके और इन पदार्थों का अधिकतम उपयोग किया जा सके। योजना स्कीम के तहत मोटे तौर पर अनुसंधान एवं विकास के जिन क्षेत्रों के प्रस्तावों को प्रोत्साहित किया जा रहा है, वे निम्नानुसार हैं:- अनुसंधान एवं विकास संबंधी प्रस्ताव, जिनके परिणामस्वरूप प्राथमिक रूप से मानवीय उपभोग के लिए तेलों की अधिक उपलब्धता और स्वीकार्यता हो सके। किफायती उपायों से संबंधित प्रस्ताव जिनके परिणामस्वरूप ऊर्जा संरक्षण किया जा सके, तेल तथा सह-उत्पादों की मात्रा और गुणवत्ता में सुधार किया जा सके तथा हानियों, साल्वेंट उपभोग तथा स्टीम उपभोग आदि को कम किया जा सके। अनुसंधान एवं विकास कार्य हेतु पहचान किए गए कुछ थ्रस्ट क्षेत्र इस प्रकार हैं :- प्रौद्योगिकी के अग्रणी क्षेत्रों का अनुप्रयोग, जैसे मेम्ब्रेन रिफाइनिंग टेक्नोलोजी, बायो रिफाइनिंग, तिलहन/तेल प्रसंस्करण का बायो- इंटेरेस्टीफिकेशन। अनरिफाइंड तथा रिफाइंड खाद्य वनस्पति तेलों का भंडारण स्थायित्व। मानवीय उपभोग हेतु उपयुक्तता के विशेष संदर्भ में तेल उद्योग के मूल्य वर्धित सह-उत्पादों/सह-उत्पादों के न्यूट्रस्युटिकल/पोषणिक पहलू। वनस्पति सहित वसाओं तथा तेलों में मिलावटी तत्वों की पहचान/निर्धारण हेतु सरल, विश्वसनीय, किफ़ायती विश्लेषणात्मक विधियों/तकनीकों का विकास। विकसित की गयी प्रौद्योगिकी के विस्तार हेतु आर एंड डी संस्थानों/संगठनों एवं उद्योग जगत के बीच संपर्क के लिए गठबंधन व्यवस्था हेतु प्रस्ताव। वनस्पति तेलों में सूक्ष्मपोषकतत्व मिलाना। राइस ब्रान ऑइल संबंधी नेटवर्किंग परियोजना। आर एंड डी कार्य वस्तुतः तीन चरणों में किए जाने का प्रस्ताव है :- चरण-1 अनुसंधान विकास। चरण-2 विकसित की गयी प्रौद्योगिकी के प्रदर्शन सहित प्रौद्योगिकी का प्रसार। चरण-3 उद्योग जगत द्वारा प्रौद्योगिकी को अपनाने हेतु प्रयास। अनुसंधान परियोजनाओं की स्वीकृति हेतु प्रक्रिया मंत्रालय की योजना स्कीम के अंतर्गत इस सुविधा का लाभ लेने के इच्छुक अनुसंधान एवं विकास उद्योगों, शैक्षणिक संस्थानों इसी प्रकार के अन्य संगठनों को अनुसंधान तथा विकास प्रस्ताव निर्धारित प्रारूप में प्रस्तुत करने की सलाह दी जाती है। इस निदेशालय में प्राप्त आर एंड डी प्रस्तावों को जांच हेतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सलाहकार समिति के अंतर्गत निम्नलिखित विचारार्थ विषयों सहित गठित उप समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है:- नई परियोजनाओं की औद्योगिक प्रयोज्यता के उद्देश्य से उनकी तकनीकी आर्थिक व्यवहार्यता की जांच करना। अनुसंधान संस्थानों/उद्योग के साथ संपर्क सहित परियोजनाओं का मूल्यांकन एव लक्ष्य निर्धारण। यह सुनिश्चित किया जाता है कि जांचाधीन आर एंड डी परियोजना किसी अन्य स्थान पर पहले से कार्यान्वित न कि गई हो। उप समिति द्वारा जांच की गई परियोजनाएं वित्तपोषण हेतु सचिव, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग कि अध्यक्षता में गठित विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सलाहकार समिति के अनुमोदनार्थ प्रस्तुत कि जाती हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सलाहकार समिति के विचारार्थ विषय निम्नलिखित हैं :- आर एंड डी परियोजनाएं शैक्षणिक संस्थानों को सौंपने के लिए स्वीकृति मंच के रूप में कार्य करना और परियोजनाओं को वित्तीय अनुमोदन प्रदान करना आदि। प्रौद्योगिकी नीति विवरण के कार्यान्वयन की प्रगति की समीक्षा करना तथा टीपीएस कार्यान्वयन के संबंध में सभी प्रकार की अनुवर्ती कार्रवाई के बारे में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के साथ समन्वय करना। आर एंड डी परियोजनाओं की प्रगति और आयातित परियोजनाओं में प्रयुक्त प्रौद्योगिकी आमेलन तथा अनुकूलन का पर्यवेक्षण एवं समीक्षा करना। एस एंड आर निविष्टियों तथा खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग की आवश्यकताओं से संबन्धित अन्य मामले। आर एंड डी परियोजनाओं पर किए जाने वाले व्यय के लिए केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के बाद निधियाँ वर्ष-दर-वर्ष आधार पर किश्तों में जारी की जाती हैं। एस टी ए सी द्वारा अनुमोदित एवं आर एंड डी संस्थानों द्वारा वित्तपोषित आर एंड डी परियोजनाओं के कार्यान्वयन की प्रगति की मौके पर समीक्षा परियोजना कार्यान्वयन समिति द्वारा की जाती है। प्रगति रिपोर्ट अर्धवार्षिक आधार पर प्रस्तुत की जाती है। प्रभारी इंवेस्टिगटर को निधियों के उपयोग का प्रमाणपत्र वार्षिक आदर पर दो प्रतियों में प्रस्तुत करना अपेक्षित होता है। संबन्धित आर एंड डी संगठन को आर एंड डी परियोजना की एक अंतिम तकनीकी रिपोर्ट भेजना अपेक्षित है। 5(III) गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र का सुदृढ़ीकरण एस एंड आर प्रभाग के अंतर्गत “गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र का सुदृढ़ीकरण” नामक एक नई प्लान स्कीम 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए प्रस्तावित की गई थी, जिसमे 7 नए गुण नियंत्रण सेल खोलना, भारतीय अनाज संचयन प्रभानधन एवं अनुसंधान संस्थान, हापुड़ तथा आई जी एम आर आई, हापुड़ में प्रशिक्षण की बुनियादी संरचना को अपग्रेड करने का प्रावधान है। योजना आयोग से सैद्धान्तिक अनुमोदन प्राप्त न होने के कारण वर्ष 2012-13 के दौरान यह स्कीम प्रचालित नहीं की जा सकी थी। एस एफ सी के अनुमोदन के पश्चात यह स्कीम सितंबर,2013 से प्रचालित कर दी गयी है। योजना आयोग के निर्देश से नई प्लान स्कीम “गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र का सुदृढ़ीकरण” को विभाग द्वारा चलाई जा रही पीडीएस का सुदृढ़ीकरण एवं क्षमता निर्माण नामक दो अन्य स्कीमों के घटक के रूप में समाहित कर लिया गया है। विभाग के एस एंड आर प्रभाग द्वारा इस योजना घटक के कार्यान्वयन की निगरानी मौजूदा क्यूसीसी तथा आईजीएमआरआई की तरह की जा रही है। एस एंड आर प्रभाग के अंतर्गत नया योजना घटक “गुणवत्ता नियंत्रण तंत्र का सुदृढ़ीकरण” केन्द्रीय क्षेत्र की स्कीम का घटक है और इस स्कीम में राज्य सरकारों के लिए कोई घटक नहीं है। इस घटक हेतु बजट अनुमान 2013-14 में 2.00 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था और संशोधित अनुमान में इसे कम करके 1.2823 करोड़ रुपये कर दिया गया है, 2013-14 के लिए अग्रिम अनुमान 1.2675 करोड़ रुपये है। वार्षिक योजना 2014-15 हेतु 10.00 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। 5 (IV) राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को राज्य खाद्य आयोगों हेतु गैर-भवन परिसंपत्तियों के लिए सहायता लोगों को गरिमामय जीवन जीने के लिए वहनीय मूल्यों पर गुणवत्ता युक्त खाद्यान्न पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराकर उन्हें मानव जीवन चक्र में खाद्यान्न और पौषणिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने दिनांक 10 सितंबर, 2013 को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 अधिसूचित किया है। इस अधिनियम में प्रावधान है कि प्रत्येक राज्य सरकार इस अधिनियम के कार्यान्वयन की निगरानी तथा समीक्षा के लिए एक अधिसूचना द्वारा एक राज्य खाद्य आयोग का गठन करेगी। यह निर्णय लिया गया है कि यदि कोई राज्य विशेष रूप से एक राज्य खाद्य आयोग का गठन करने का निर्णय लेता है तो केन्द्रीय सरकार उस राज्य खाद्य आयोग के लिए गैर-भवन परिसंपत्तियों हेतु एकबारगी वित्तीय सहायता प्रदान करेगी। तदनुसार विभाग कि अम्ब्रेला स्कीम “पी डी एस का सुदृढ़ीकरण एवं क्षमता निर्माण, गुणवत्ता नियंत्रण, परामर्श तथा अनुसंधान” के अंतर्गत 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान एक नया घटक अर्थात “राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को राज्य खाद्य आयोगों हेतु गैर-भवन परिसंपत्तियों के लिए सहायता” शामिल किया गया है। इस घटक के लिए 12वीं योजना हेतु अनुमानित परिव्यय 16.60 करोड़ रुपये है। बजट अनुमान 2014-15 में इस घटक के लिए 5.00 करोड़ रुपये की राशि प्रदान की गई है। टी पी डी एस प्रचालनों के एक सिरे से दूसरे सिरे तक कम्प्यूटरीकरण संबंधी स्कीम के घटक -1 के अंतर्गत जारी की गई निधियाँ (दिनांक 31.03.2014 की स्थिति के अनुसार) क्र.सं. राज्य/संघ राज्य क्षेत्र जारी की गई निधि (करोड़ रुपए में) 2012-13 2013-14 जोड़ आंध्र प्रदेश - 19.42 19.42 असम - 9.87 9.87 बिहार - 17.89 17.89 छत्तीसगढ़ - 3.35 3.35 गोवा - 1.87 1.87 हिमाचल प्रदेश - 4.24 4.24 जम्मू एवं कश्मीर - 6.11 6.11 केरल - 7.30 7.30 झारखंड - 9.47 9.47 लक्षद्वीप - 0.70 0.70 मध्य प्रदेश 5.43 11.91 17.34 महाराष्ट्र - 20.92 20.92 मणिपुर 2.60 1.64 4.24 मेघालय - 5.51 5.51 मिजोरम 4.91 - 4.91 नागालैंड 3.39 2.14 5.53 ओडिशा 11.08 - 11.08 पंजाब 7.79 - 7.79 तमिलनाडु - 11.83 11.83 त्रिपुरा - 5.85 5.85 उत्तर प्रदेश - 28.33 28.33 उत्तराखंड 5.24 - 5.24 पश्चिम बंगाल - 15.17 15.17 जोड़ 40.44 183.52 223.96 ख. क्र.सं. एनआईसी (मुख्यालय) 2012-13 2013-14 जोड़ 1. एनआईसीएसआई के माध्यम से एनआईसी 0.54 - 0.54 2. एनआईसी - 0.90 0.90 3. एनआईसी - 2.00 2.00 जोड़ 0.54 2.90 3.44 ग क्र.सं. एनआईसीएसआई (सीपीएमयू सेवाओं के लिए) और परामर्शदाता 2012-13 2013-14 जोड़ 1 एनआईसीएसआई 0.71 0.60 1.31 2. परामर्शदाता - 0.03 0.03 जोड़ 0.71 0.63 1.34 कुल जोड़ (क+ख+ग) 41.69 187.05 228.74 लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) प्रचालनों के एक सिरे से दूसरे कम्प्यूटरीकरण की स्थिति का विवरण (31.03.2014 की स्थिति के अनुसार) एफपीएस आंकड़े* गोदाम आंकड़े * राशनकार्ड आंकड़े * ऑनलाइन आवंटन आपूर्ति-श्रृंखला पारदर्शिता पोर्टल ऑनलाइन शिकायत टोल फ्री नंबर अं. एवं निको. द्वीपसमूह 100% - 100% चल रहा है - हां हां हां आंध्र प्रदेश ** 100% 100% 100% 2 ज़िले - - हां हां अरुणाचल प्रदेश 100% 64% 76% कुछ स्थान - हां - हां असम 100% 82% - - - - - हां बिहार 100% 44% 89% - - हां हां हां चंडीगढ़ 100% 100% 79% कार्यशील नहीं है - हां हां हां छत्तीसगढ़ 100% 100% 100% कार्यान्वित कार्यान्वित हां हां हां दादरा और नगर हवेली 100% 100% 57% - - हां - हां दमन और दीव 100% 100% 51% - - - - - दिल्ली 100% अनुपलब्ध 100% कार्यान्वित कार्यान्वित हां - हां गोवा 100% 100% 100% चल रहा है चल रहा है हां हां हां गुजरात 100% 100% 100% कार्यान्वित चल रहा है हां हां हां हरियाणा 96% 100% 83% केवल 4 ब्लॉक - हां हां हां हिमाचल प्रदेश 100% 100% - - - हां हां हां जम्मू-कश्मीर 100% 100% 86% - - - - हां झारखंड 100% - 98% 3 ज़िले - हां हां - कर्नाटक 100% 100% 100% कार्यान्वित कार्यान्वित हां - हां केरल 100% 100% 100% - - हां - हां लक्षद्वीप 100% 100% 90% - - - - - मध्य प्रदेश 100% 100% 100% - - हां - - महाराष्ट्र 100% 100% 100% कार्यान्वित - हां हां हां मणिपुर 100% 100% 50% - - - - हां मेघालय 100% 100% - - - हां हां हां मिजोरम 100% 100% 45% - - - - हां नागालैंड 100% 100% - - - - - हां ओडिशा 100% 100% 2% आंशिक रूप से आंशिक रूप से हां हां हां पुद्दुचेरी 100% अनुपलब्ध 100% 2 मंडल 2 मंडल हां हां - पंजाब 100% 100% 100% - - - - - राजस्थान 92% 100% 60% - - - हां हां सिक्किम 100% 100% 100% - - हां - हां तमिलनाडु 100% 100% 100% - - - हां - त्रिपुरा 100% 100% 80% - - - - - उत्तर प्रदेश 100% 100% 42% - - हां - हां उत्तराखंड 100% 100% - - - हां - - पश्चिम बंगाल 100% 100% 64% - - हां हां हां स्रोत: उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, भारत सरकार